BJP घटा सकती है सिविल सर्विसेज़ की उम्र सीमा

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लखनऊ। 2019 के लोकसभा चुनावों में अगर भारतीय जनता पार्टी दोबारा सत्ता में आयी तो वह सिविल सर्विसेज़ के छात्रों के लिए उम्र में कटौती का फरमान ला सकती है । कई मौकों पर प्रधानमंत्री मोदी, कम उम्र के कलेक्टरों को प्रशासनिक कार्यों में लगाने की जरुरत की वकालत कर चुके है । उनका साफ़ तौर पर मनना है कि 40-45 की उम्र में एक प्रशासनिक अधिकारी को घर-परिवार,बच्चों तथा तबादलों सम्बंधित समस्याओं का सामना करना पड़ता है । इसलिए 28-30 उम्र के युवा ही कहीं ज़्यादा बेहतर काम कर सकते है ।

इस मामले में बासवान कमिटी की रिपोर्ट भी सरकार के पास आ चुकी है । जिनमे उम्र को घटाने और एटेम्पस को कम करने सम्बंधित शिफारिशें है । साथ ही इस बार तक़रीबन 60 प्रतिशत 26-28 के उम्र के युवाओं का यू०पी०एस०सी द्वारा चयन किया गया है ।

सिविल सर्विसेज़ में उम्र और एटेम्पट्स को लेकर कई वर्षों से वाद-विवाद की श्रृंखला जारी है । इन मामलों में यू पी एस सी जैसी संस्था को भी अपने हिसाब से फैसले लेने का अधिकार नहीं है । ऐसे बड़े फैसलें राजनितिक इच्छाशक्ति पर निर्भर होती है । सरकार जब चाहे उम्र या एटेम्पट्स को घटा-बढ़ा कर छात्रों के भविष्य के साथ खेल सकती है। दिक़्क़त उम्र या एटेम्पस के साथ नहीं बल्कि फैसले लेने वालों और उनके दलीलों पर है ।

राजनीति में 50-60 साल का व्यक्ति देश चला सकता है ।मगर प्रशासनिक कार्य करने के लिए उम्र की सीमा निर्धारित है, ऐसा क्यों ? क्या देश चलाना ज्यादा आसान है प्रशासनिक कार्यों से ? अगर राजनीति में लाइफ टाईम मौका मिल सकता है तो सरकारी नौकरी के लिए क्यों नहीं ? क्या राजनीति में जाने के लिए कोई एटेम्पस या आयु निर्धारित नहीं किया जाना चाहिये? और ये राजनीतिज्ञ कौन होते है यह फैसला करने वाले की किस परीक्षा की क्या उम्र और एटेम्पस कितनी होनी चाहिये ? जब इनकी खुद की ना तो कोई उम्र ना कोई एटेम्पस और ना ही कोई क्वालिफिकेशन निर्धारित है । और तो और इनको ना किसी प्रकार के कॉम्पेटेटिव एग्जाम से गुजरना होता है और ना ही इंटरव्यू प्रणाली से । फिर इनको क्या पता कि छात्रों के दबाव का स्तर क्या है ? छात्रों का कलेक्टर बनना सपना होता है ।

ऐसे में उनके सपने को पूरा करने के लिए मौकों में कटौती कर दी जाये, तो उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी, इसका बात का अंदाज़ा शायद सरकार को नहीं है ।

मानती हूँ कि कम उम्र का युवा बेहतर प्रदर्शन कर सकता है , मगर पहले उसको मौका तो मिले । नौकरियों का हाल तो ये है कि अब पढ़े-लिखे युवाओं को पकौड़े बेचने की सलाह मिलने लगी है । आधी से ज्यादा सरकारी नौकरियों के परिणाम और नियुक्ति पिछले 4-5 साल से अटकी हुई है । बेरोजगारी चरम सीमा पर है । स्किल इण्डिया और मेक इन इण्डिया जैसे प्रोजेक्ट्स भी दिखावा मात्र है रोजग़ार की अब भी मारामारी है ।

शिक्षा का हाल भी किसी से छिपा नहीं है। बिहार और यूपी में शिक्षा के स्तरों में लगातार गिरावट आ रही है । बिहार में तो ग्रेजुएशन का परिणाम आने में 3 से 4 साल लग जाते है । ऐसे में जब कोई छात्र 24-25 साल में स्नातक पास करेगा, तो सिविल सर्विसेज़ की तैयारी कब शुरू करेगा ? शुरू करने से पहले ही उसकी उम्र निकल चुकी होगी या तैयारी करते करते उसके एटेम्पट्स चले जायेंगे । बड़े शहरो के साथ तो कोई दिक्कत नहीं है,मगर ग्रामीण भारत जहाँ बच्चों की पढ़ाई ही 7-8 साल से शुरू कराई जाती है ऐसे में उम्र या एटेम्पस को घटाना उनके लिए न्यायोचित नहीं है ।

और जहाँ तक युवा होने और काम करने की परिभाषा मोदी जी समझा रहे है क्या वे बताएँगे की राजनीति में 40-45 वर्ष की आयु वाला व्यक्ति युवा नेता क्यों कहलाता है जबकि सरकारी नौकरी के लिए यह उम्र लगभग रिटायरमेंट की मानी जाती है ।

उनकी यह दलील कि 40-45 की उम्र में लोग पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते बेहतर कार्य नहीं कर पाते, सही नहीं है । क्योंकि 18 साल के बाद से हर युवा को वोट देने और शादी करने का अधिकार है। ऐसे में चाहे वह 18 साल में शादी कर ले या 28-30 साल में । पारिवारिक जिम्मेदारियां को आधार बनाकर उम्र को घटाने की बात है तो सरकारी नौकरी में शादी को ही बैन कर देना चाहिये । क्योंकि जिम्मेदारी तो 26-28 साल में भी आ सकती है तब क्या वह व्यक्ति काम करने के लिए अयोग्य हो जायेगा? राजनीति और सरकारी नौकरियों में आने वाले व्यक्तियों के लिये युवा होने का पैमाना अलग-अलग क्यों है ? कुल मिलाकर एक बात यह है कि राजनितिक इच्छाशक्ति हर जगह हावी है ।

ये लोग हर किसी के लिए नियम -कानून और प्रक्रिया निर्धारित करते है । मगर इनके लिए कोई कानून अथवा प्रक्रिया नहीं है । जहाँ तक मौको की बात है तो साफ़ है अगर किसी राजनीतिज्ञ को देश चलने का मौका मिल रहा है वो भी बिना शर्त के, तो काम करने और सरकारी नौकरी पाने का मौका भी देश के हर व्यक्ति को मिलना चाहिए वो भी बिना शर्त । जब देश चलाने में उम्र बांधक नहीं है तो प्रशासनिक कार्य करने में उम्र सीमा क्यों ? राजनेताओं से कहीं ज्यादा मेहनत छात्र अपने जीवन में नौकरी पाने के लिए करते है ।

अतः किसी भी राजनेता को यह अधिकार नहीं है कि वह उम्र सीमा में छात्रों को बांध कर उसे अपने सपने पूरे करने से रोके जबतक कि वह स्वमं इस क़ाबिल ना हो। रही बात उम्र सीमा बढ़ाने को लेकर इस दलील कि फिर छात्र पूरा जीवन तैयारी या अवसाद में गुजारेंगे । तो ऐसे में परीक्षा प्रणाली को सरल करे और अन्य अवसरों को बढ़ाये,बजाए इसके कि उम्र सीमा घटा दे । एक तो युवा नौकरी को लेकर वैसे ही परेशान है । वह कही ना कही वह सरकारी नौकरी की तैयारी करने में व्यस्त है । उसे उम्मीद है कि आने वाले समय में उसको नौकरी मिल जायेगा। ऐसे में उम्र को घटाकर उसके दबाव को और अधिक नहीं बढ़ाना चाहिए ।

बहुत सारी नौकरियों की भरमार होती तो अलग बात होती,मगर जब नौकरी के कोई आसार ना हो तो उनको किसी परीक्षा की तैयारी में व्यस्त रहने देना ज्यादा उचित है। कम से कम वे कुछ कर रहे होते है और अवसाद भी कम रहता है। या तो सरकार यह कह दे की सरकारी नौकरी किसी को नहीं मिलेगी या फिर सबको देने का वायदा कर दे । अगर कुछ नहीं कर पा रही तो अपना पक्ष अपने ही पास रखे ।

चुनाव में कई बार हारने के बाद भी चुनाव लड़ने की आज़ादी है । हारा हुआ व्यक्ति किसी भी उम्र में कभी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बन कर देश चलाने का हकदार हो सकता है तो क्या देश का आम नागरिक किसी भी उम्र में सरकारी नौकरी पाने का हकदार नहीं बन सकता ? या तो सरकार अपने लिए कोई उम्र, क्वालिफिकेशन, एटेम्पट्स या परीक्षा निर्धारित करे और तब छात्रों ,परीक्षाओं और उम्र सम्बंधित कटौती का फैसला करे या फिर युवाओं के लिए सरकारी नौकरी के लिए हर मौके खोल दे और उम्र घटाने-बढ़ाने सम्बंधित बातों पर अपना फरमान अपने ही पास रखे।

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