पूरा पढ़ने की हिम्मत नहीं है!

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Lucknow. मुर्गे की बांग से पहले चुन्नू की अम्मा के तांडव ने मुझे अधकच्ची नींद में ही जगा दिया। कीचर साफ करते हुए मामले को जानने के लिए तौलिया बांधी और मौके पर पहुंचा तो पता चला बड़कई बहुरिया से अम्मा खफा हैं दरअसल पिछले दिनों उज्जवला योजना में सिलेंडर मिलने के बाद बहुरिया ने सोचा अच्छे दिन आ गए हैं, उसने मिट्टी के चूल्हे पर मिट्टी डाली और उज्जवला चूल्हा ​स्थापित कर दिया। पिछले एक महीने से तो चांदी रही लेकिन आज सुबह गैस खत्म होते हुए अच्छे दिन का सपना टूट गया। मजदूरी करने वाला अम्मा के परिवार के पास रोटी दाल के भी लाले हैं अब वह 820 का सिलेंडर कैसे भरवाए। अम्मा ने उज्जवला चूल्हे को कोपचे में रखते हुए मिट्टे के चूल्हे को खोजना शुरू किया तो पता चला बहुरिया ने उसे​ मिट्टी में मिला दिया।

…अम्मा का खउराना लाजमी था। वैसे तो यह एक छोटी कहानी है, लेकिन यही आज की असलियत है। उज्जवला योजना की टॉफी आपने चूसी है क्या? …जिसने एक बार चूसी दोबारा नहीं चूस सका, अजी उसके दांत खट्टे हो गए। उज्जवला के चक्कर में सामान्य वर्ग के दांत तो और ज्यादा खट्टे हो गए। कुछ गरीबों को मुफ्त की उज्जवला वाली मलाई चटाई गई और हाजमा सबका खराब हो गया। कांग्रेस के राज में जो सिलेंडर 316—400 रुपए में रिफिल होता था उसकी आज की कीमत लगभग 820 है। इसमें कही सुनी लगभग 120 से 150 या थोड़ा और ज्यादा रुपए की सब्सिडी आती है वह भी किसी किसी की, सबकी नहीं।

कांग्रेस राज में इसी सरकार के लोग गैस के थोड़े दाम बढ़ने पर सड़क पर उतर आए थे। आज इनको सांप सूघ गया। हर सभा में हाकिम तारीफे बटोर रहे हैं, हमने उज्जवला देकर लाखों मांओं को धुएं से बचा लिया। असलियत से सभी अंजान हैं, मैंने दो आरटीआई लगाई हैं और यह जानने की कोशिश की है कि उज्जवला योजना में दिए गए सिलेंडर में कितनों की रिफलिंग हुई, यकीन मानिए डेढ़ महीना हो गया जवाब नहीं आया है।

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साभार— सुयश मिश्रा की वाल से

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