VIDEO: शिक्षामित्रों के लिए चुनौती: दो पहलवानों को पटकनी देगा एक बूढ़ा इंसान

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अचंभित मत होइए, दिल थाम कर बैठिए। क्योंकि यह यूपी है दोस्तों यहां कुछ भी हो सकता है। यह अखाड़ा उत्तर प्रदेश में ही खोदा गया है। कोई टिकट नहीं है। कोई पाबंदी नहीं। आप विश्व के किसी भी कोने से इस युद्ध का मुफ्त में मजा ले सकते हैं।

इस अखाड़े की गहरी तफ्तीश अगर पसंद आए तो लाइक शेयर और कमेंट भी कर सकते हैं। नीचे दिए गए वीडियों में आप देख सकते हैं पूरी तफ्तीश। वीडियो अगर पसंद आए तो लाइक शेयर करना न भूलें। साथ ही हमें फॉलो करके वेल आइकन दबा दें।

नीचे दिया गया वीडियो 2015 का है तब योगी सांसद थे अखिलेश यादव को बड़े बड़े सुझाव दे रहे थे। अब वह खुद सीएम हैं। बतौर सांसद के तौर पर जो समाधान वह बता रहे थे अब वह कहां है? योगी जी अखिलेश सरकार में मृतक शिक्षामित्रों के परिजनों को 5 लाख मुआवजा देने की वकालत कर रहे थे। दोस्तों उत्तर प्रदेश में अब तक तकरीबन 650 शिक्षामित्रों की हार्टअटैक, गरीबी, अवसाद, आत्महत्या से मौत हो चुकी है। लेकिन अब जब वह सीएम हैं तो कितने शिक्षामित्रों को पांच लाख दिए। अजी पांच लाख छोड़िए 5 पैसे भी नहीं दिए।

प्रदेश सरकार ने अपने मेनिफेस्टो में शिक्षामित्रों को स्थाई समाधान देने की बात कही थी। और आज यह सरकार सीना ठोक कर कह रही है। कि साढे तीन हजार पाने वाले शिक्षामित्रों को हमने 10 हजार दे दिया। लेकिन यह सरकार यह क्यों नहीं कह रही कि अखिलेश सरकार 1 लाख 37 हजार समाजित हो चुके जिन शिक्षा मित्रों को 40 हजार दे रही थी उन्हें भी आपने 10 हजार पर ला दिया। हां आपने 34 हजार शिक्षा मित्रों की सैलरी साढ़े तीन से बढ़ाकर 10 हजार कर दी। लेकिन सवाल है कि क्या यह स्थायी समाधान है।

दोस्तों क्या कोई एक टेस्ट परफेक्ट स्केल है कि आप उस विषय में महारथी हैं। शायद नहीं। हैंड्स आॅन ट्रेंनिंग यानी तजुर्बा ज्यादा मायने रखता है। शिक्षामित्र 10 साल से पढ़ा रहे हैं इससे बड़ी ट्रेनिंग क्या हो सकती है। लेकिन उन्हें टीईटी से मुक्त नहीं किया गया। इतना ही नहीं इसके बाद योगी जी ने तो और हद कर दी। एक और टेस्ट रख दिया। लगभग 35 हजार शिक्षामित्रों ने टीईटी पास लेकिन सवाल यह ळै कि अब 35 से 40 पार कर चुके इन शिक्षामित्रों से आप आधुनिक कंपटीशन कैसे बीट करवा सकते हैं।

दोस्तों लेकिन यह हास्यास्पद ड्रामा यूपी में चल रहा है। सवाल एक दो लोगों का नहीं उन 1 लाख 72 हजार लोगों का हैं जिन्होंने अपनी जिंदगी के बेसकीमती 16 साल कुर्बान कर दिए। कुर्बान इसलिए कहूंगा क्योंकि यह शिक्षामित्र सिर्फ साढ़ेतीन हजार में भी वहीं किताब पढ़ाते थे जो 60 हजार रुपए लेकर एक स्थायी टीचर पढ़ाता था। अब सवाल यह है। समान कार्य समान वेतन कहां है। दोस्तों जब शिक्षकों का अकाल था, स्कूलों में ताले लगे थे तो इन्हीं शिक्षामित्रों के दम पर प्राइमरी एजुकेशन दौड़ी थी। आप अनुमान लगाकर या जोड़कर हमें बताइएगा कि 60 हजार का काम साढे तीन हजार में करके इन शिक्षामित्रों ने पिछले 17 सालों में सरकार का कितना कोस बचा लिया।

आपको बता दें कि 2002 से 2009 तक इन शिक्षामित्रों की नियुक्ति हुई।
अखिलेश के राज में 2014 में शिक्षामित्रों का सहायक शिक्षक के पद पर समायोजन हुआ था। दो चरणों में एक लाख 37 हजार शिक्षामित्रों का समायोजन हुआ।
तीसरे चरण से पहले मामला अदालत चला गया। 12 सितंबर 2017 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शिक्षामित्रों को सहायक शिक्षक बनाने के फैसले को रद्द कर दिया।

हर प्रदेश में ऐसी कहानी होगी जहां काम करने के बाद बाहर फेंक दिए गए। अदालतो से जीतने के बाद भी इनकी नियुक्त नहीं होती अगर हार जाते हैं तो कोर्ट के फैसले का बहाना बनाकर हमेशा के लिए सुनवाई बंद कर दी जाती है। सरकार की नीति बननी चाहिए।

2002 में सैलरी 1850 थी।
2014 में 3500 पहुंची
11 जुलाई 2011 को यूपी सरकार ने कहा कि इन सभी को दूरस्थ शिक्षा के जरिए बीटीसी कराया जाए ।जब इनकी नियु​िक्त हुई थी उस समय इंटर पास थे लेकिन ज्यादातार ने बीए और कुछ ने बीटीसी भी कर ली थी।
1 अगस्त 2014 से इनहें लगभग 40 हजार मिलने लगा।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इनका समायोजन रद्द कर दिया।
25 जुलाई 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा।

पूरे देश में 8 लाख लोग शिक्षामित्र शिक्षा सहायक हैं।
हरियाणा में शिक्षामित्रों को 12 महीने का वेतन मिलता है और हर महीने 21,714 रुपए।
पंजाब में शिक्षामित्रों को 12 महीने का वेतन 19,400
महाराष्ट में 12 महीने वेतन और 35000 सैलरी मिलती है।
नागालैंड में शिक्षामित्रों को सारी सुविधाए मिल रही हैं।
फिर यूपी में 10 हजार वेतन और 11 महीने काम क्येां।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है
23 अगस्त 2010 के नोटिफिकेशन की तारीख के बाद शिक्षकों की नियुक्ति के लिए जो न्यूनतम पात्रता तय की गई है। उसके तहत शिक्षामित्र नहीं आते।
इसके कारण उनहें रेगुलर नहीं किया जा सकता है। इस न्यूनतम पात्रता के बगैर कोई नियुक्ति नहीं हो सकती और इस केस में नियुक्ति 2010 के बाद हुई हैं। शिक्षामित्रों की नियुक्त न सिर्फ ठेके पर हुई थी बल्कि शिक्षक बनने की पात्रता या शिक्षक को मिलने वाले मानदेय के हिसाब से भी नहीं हुूई थी। इसलिए इनहें शिक्षक के रूप में नियमित नहीं किया जा सकता। सुपीम कोट्र ने जो अपवाद स्वरूप फैसले दिए हैं मौजूदा केस के संदर्भ में लागू नहीं होते। हमारा मानना है कि शिक्षामित्र कभी भी शिक्षक के रूप में नियुक्त नहीं हुए थे और न ही ये सर्व शिक्षाा अभियान कानून की धारा 23(2) के तहत मिली छूट के दायरे में आते हैं। इसलिए भी इनकी नियुक्ति नहीं हो सकती ळै। राज्य सरकार को अपनी तरफ से छूट देने का अधिकार हासिल नहीं है। एक तरफ हमारे सामने नियमों का उल्लंघन कर एक लाख 78 हजार लोगों को नियमित किए जाने का दावाहै तो दूसरी तरफ हमारा दायित्व है कि हम कानून के राज को कायम रखें।
हमें इस बात काभी सम्मान रखना है कि सर्व शिक्षा अभियान के तहत 6 से 14 साल के बच्चों को उचित तरीके से प्रशिक्षित शिक्षकों से शिक्षा मिले।

650 लोग अब तक मर चुके हैं।
कई कमेंटियां बनी पर हल नहीं निकला।

एजुकेशन में पिछले 10 से 20 सालों में प्राइमरी एजुकेशन पर सरकार ने इनवेस्ट करना ही बंद कर दिया है।
सरकार ने साढ़े तीन हजार रुपए देकर कितने करोड़ रुपए बचा लिए होंगे।

चुनाव से पहले
शिवराज सिंह ने एमपी में 2 लाख शिक्षामित्रों को रेगुलराइज करने के लिए कहा है। ये कैबिनेट का डिसीजन हुआ हैं

सुप्रीम कोर्ट कह रही है
पाल्र्यामेंट ने क्वालीफिकेशन को ले डाउन और ये कहा कि एक्पीरियंस होनी चाहिए।
जब आप 40 हजार ले रहे हैं तो ये अयोग्य हो गए । और आप 10 हजार देकर इन्हें योग्य बताकर क्लास रूप में भेज रहे हैं।
कोर्ट कह रही है कि ये कभी टीचर थे ही नहीं। अलग अलग सरकारों की सजा इन्हें मिल रही हे। जिओ में लिखा गयाथा कि ये केम्यूटी सर्विस है। ये रेग्युलेराइज की मांग नहीं कर सकते।

क्या कर सकती है सरकार
सरकार में अगर इच्छाशक्ति हो तो न्याय कर सकती है।
सरकार अध्यादेश ला सकती है।
वरना असिस्टेंट टीचर बनाकर अलग क्रेडर बना सकती है। लोवर क्वालीफिकेशन ला सकती है।

इनको अध्यादेश लाकर नियमित कर चुकी ळैं सरकारें।

1984 में 14 अस्थाई जजों को हाईकोर्ट इलाहाबाद में नियमित किया गया था। जिसको सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था। इसके बाद सरकार ने अध्यादेश लाकर उनको नियमित कर दिया। पोटा में भी यही हुआ। तमिलनाडु में जलीकट्टू को लेकर सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ सरकार अध्यादेश ले आई। साड़ों के लिए, बैलों के लिए अध्यादेश लाया जा सकता है। पर अध्यादेश नही।

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