एससी-एसटी एक्ट का ग़लत इस्तेमाल अब नहीं

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एससी-एसटी एक्ट सुर्ख़ियों में है । तमाम हो हल्ला के बावजूद सुप्रीम कोर्ट के द्वारा इस कानून में किये बदलाव को पहले तीन भाजपाशासित राज्यों मध्यप्रदेश,छतीसगढ़ और राजस्थान ने लागू किया और बाद में मंथन के पश्चात्
छत्तीसगढ़ सीएम ने पुलिस मुख्यालय से जारी आदेश को स्थगित कर दिया है । जबकि मप्र सरकार ने कहा कि कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अधीन होगी । जबकि
राजस्थान में मुख्यमंत्री को पुलिस के आदेश की जानकारी ही नहीं है । अब सवाल यह पैदा होता है कि अगर भाजपा इसके विरोध में है तो भाजपाशासित राज्यों ने एससी-एसटी एक्ट में हुए बदलाव को पहले लागू क्यों किया और बाद में वापस क्यों लिया ? सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें क्या कार्यवाही करती है यह देखना दिलचस्प होगा । आने वाले संसद के जुलाई सत्र में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पलटने में सरकार कितनी कामयाब रहती है यह तो वक्त तय करेगा । बरहाल सुप्रीम कोर्ट ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है कि इस एक्ट के मूल भाव को ना तो नष्ट किया गया है ना ही इसको हल्का करने का प्रयास किया गया है । नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) 2015 का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एससी-एसटी एक्ट के तहत 15-16 प्रतिशत फ़र्ज़ी मामले दर्ज हुए है । इस एक्ट का दुरूपयोग ना हो तथा भविष्य में किसी भी निर्दोष को सजा ना मिले इसलिए इस कानून में जरुरी बदलाव हुए है ।
क्या है यह बदलाव ?
मामला संज्ञान में आते ही तत्काल गिरफ्तारी और एफआईआर पर रोक लगा दी गयी है । सात दिन के भीतर मामले की जाँच डीएसपी स्तर पर करने के बाद कार्यवाही करने की बात कही गयी है । साथ ही शीर्ष अदालत ने कहा कि सरकारी अधिकारी की गिरफ्तारी अपॉइंटिंग अथॉरिटी की मंजूरी के बिना नहीं की जा सकती तथा गैर-सरकारी कर्मचारी की गिरफ्तारी के लिए एसएसपी की मंजूरी अब जरूरी होगी ।
सुप्रीम कोर्ट ने साथ ही यह भी कहा है कि एससी/एसटी क़ानून का यह मतलब नहीं कि जाति व्यवस्था जारी रहे । क्योंकि ऐसा होने पर समाज में सभी को साथ लाने में और संवैधानिक मूल्यों पर असर पड़ सकता है । कोर्ट ने कहा कि संविधान बिना जाति या धर्म के भेदभाव के सभी की बराबरी की बात कहता है।

क्यों हो रहा है विरोध ?
इस कानून के पक्षधरों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट को कमज़ोर किया है । अब तक इस एक्ट के जरिये जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने पर तुरंत मामला दर्ज कर लिया जाता था । केस दर्ज होने के बाद तुरंत गिरफ्तारी का भी प्रावधान था । ऐसे मामलों की सुनवाई केवल स्पेशल कोर्ट में ही होती थी । साथ ही अग्रिम जमानत भी नहीं मिलती थी । सिर्फ हाईकोर्ट से ही जमानत मिल सकती थी। ऐसे में झूठे मामलें दर्ज होने पर ना सिर्फ अभियुक्त बल्कि कोर्ट और पुलिस का भी समय नष्ट होता है साथ ही कोर्ट कचहरी के चक्कर में व्यक्ति का मानसिक उत्पीड़न और मर्यादा का उलंघन होता था वह अलग । मगर अनुसूचित-जाति एवं जनजाति के हितों के संरक्षक तथा उनकी स्थिति को मजबूत करने के उद्देश्य से विरोधी पार्टी के साथ ही वर्तमान सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान फैसले को पलटने का मन बना लिया है। वर्तमान बदलाव के चलते तमाम दलित और जनजाति समुदायों में रोष व्याप्त है । जिसका भयानक रूप अभी हालही में भारत बंद और दलित आंदोलन के रूप में दिखा । इन समुदायों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद से कमज़ोर वर्गों में भय पैदा होगा तथा उनके खिलाफ अत्याचार में बढ़ोतरी होगी । इस विशेष जाति के लिए काम कर रहे लोगों का कहना है कि इस कानून को कमज़ोर करने की बजाए, सख्त किया जाना चाहिए। क्योंकि आँकड़ों में अब भी दलित अत्याचार के सही मामले ज्यादा है, ग़लत की अपेक्षा । एक और दलील ये है कि फ़र्ज़ी मामले हर जगह बढ़ रहे है ऐसे में इसी कानून को ही निशाना क्यों बनाया गया है ? बदले की भावना से या फिर पैसों के लिए अगर इस कानून का कहीं दुरुपयोग होता भी है तो इसके लिए एससी-एसटी एक्ट के अलावा दुराचार और मानहानि सम्बंधित अन्य कई कानून मौजूद है जिसकी मदद से निर्दोष व्यक्ति राहत पा सकता है । ऐसे में एससी-एसटी एक्ट को कमजोर करने का क्या औचित्य था ?

हालाँकि सुप्रीम कोर्ट की मंशा और दलीलों पर कोई संदेह नहीं कि वह प्रत्येक नागरिक को सामान अधिकार देने की पक्षधर है । और कोर्ट इस बात को भी सुनिश्चित करती है कि किसी निर्दोष को सजा ना मिले और समाज में समानता बनी रहे । जाति या लिंग के आधार पर किसी विशेष वर्ग को क़ानूनी लाभ प्राप्त होने के वजह से यदि कोई बेगुनाह फॅस जाता है, तो यह गलत है । भले ही वह निर्दोष व्यक्ति अकेला ही क्यों ना हो ।
सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला बहुत हद तक सही नज़र आएगा अगर हम कुछ विशेष पहलुओं पर ध्यान दें । इससे पहले कि मैं सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पक्ष में कुछ बिंदु लिखूं ,मैं अपने पड़ोस में घटित एक घटना का जिक्र करना चाहूंगी । घटना चंद रोज़ पहले की है । एक निज़ी महिला हॉस्टल में दो छात्राओं में बहस शुरू हुई । बताया जाता है कि बहस में मुस्लिम छात्रा ने दलित छात्रा को कुछ अपशब्द और जातिसूचक शब्द कहें । ज़ाहिर है दलित छात्रा ने भी प्रतिउत्तर के रूप में कुछ अपशब्द कहें होंगे । बरहाल, दलित छात्रा इस बात को लेकर थाने पहुँच गई । थाने में सुलहनामा कराया गया । मुस्लिम छात्रा ने सबके सामने अपनी गलती की माफी मांगी ली। दोनों को तत्काल हॉस्टल खाली करने का आदेश हुआ । मगर बात तब और ज्यादा पेंचीदा हो गई जब दलित छात्रा ने हॉस्टल खाली करने से मना कर दिया और एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्यवाही की मांग करने लगी । जाति सूचक शब्दों, जाति को लेकर दबाव बनाने और जातिगत भेदभाव को लेकर अपने केस को मजबूत बनाने में जुटी छात्रा यह भूल गई कि उसी हॉस्टल में वह तक़रीबन साल भर से और उसकी बहन तक़रीबन 3 साल से रह रही थी। अगर जाति को लेकर कोई मसला अबतक हुआ होता तो वे इतने सालों से उसी हॉस्टल में ना रह रही होती । मेरे कहने का सिर्फ यह मतलब है कि बेवज़ह की छोटी-मोटी लड़ाई या बहस के लिए कोर्ट और पुलिस का समय नष्ट नहीं किया जाना चाहिए। वह भी सिर्फ इसलिए कि किसी विशेष जाति या वर्ग के लिए विशेष प्रबंध और अधिकार है ।
हालांकि जातिगत भेदभाव और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल हर हाल में ग़लत है । यह सिर्फ दलितों में नहीं है । एक जाति दूसरी जाति में वैवाहिक संबंध बनाने में आज भी हिचकिचाती है । हालांकि अब धीरे -धीरे ट्रेंड बदल रहा है । जातिसूचक शब्दों का प्रयोग लगभग हर जाति में होता है । उदाहरण के तौर पर पंडित को धूर्त, बनिया को कंजूस, लाला को शातिर दिमाग और राजपूत को गुस्सैल समझा जाता है । आजकल ये जातिसूचक हर किसी के लिए इस्तेमाल कर लिया जाता है । तो क्या अब सामान्य वर्ग के लोगों को भी जातिसूचक शब्दों के प्रयोग के लिए कोर्ट का रुख करना चाहिए। क्या अब उनके लिए भी अलग से कानून बना दिया जाना चाहिये?
छोटी-छोटी बातों के लिए आज असहनशीलता बढ़ रही है । युवाओं में बर्दाश्त करने की क्षमता घट रही है । यही कारण है कि आजकल मामूली बातों पर उतेजना,मार-पीट, आक्रोश आदि का भयानक रूप सामने आने लगा है । आज बदले की भावना से ग्रसित इंसान किसी भी हद तक जाने को तैयार बैठा है। लगातार बलात्कार, दहेज़, महिला व् दलित उत्पीड़न आदि के झूठे मामलें दर्ज हो रहे है । कानून का संरक्षण पाने वाले कानून का दुरूपयोग तो कर ही रहे है साथ ही विशेष कानून की वजह से अपना धौस भी जमा रहे है । ऐसे में क्या यह न्यायोचित नहीं है कि पहले मामलें जांच हो और सही पाए जाने के बाद ही आरोपी पर एफआईआर या गिरफ्तारी हो। कम से कम इससे किसी निर्दोष को तो सजा से बचाया जा सकेगा। यह कहाँ तक सही होगा कि एससी-एसटी एक्ट के तहत किसी दलित व्यक्ति के कहने मात्र से अभ्युक्त गिरफ्तार हो जाये और अग्रिम जमानत भी ना हो । दोषी व्यक्ति के लिए तो यह प्रावधान सही दिखता है मगर निर्दोष व्यक्ति इसमें नहीं पिसेगा इस बात की कोई गैरंटी नहीं है। कोर्ट तय करती है कि न्याय देर से हो मगर किसी निर्दोष के साथ अन्याय ना हो ।

निम्न वर्गों के साथ एक समय था,जब भेदभाव बहुत अधिक था । मगर अब ना सिर्फ यह भेदभाव कम हुआ है बल्कि हर जगह उनका प्रतिनिधित्व बढ़ा है । प्रतिभा से जाति का कोई लेना-देना नहीं होता । प्रतिभावान हर जगह पूजा जाता है । यक़ीनन कई जगह आज भी जाति, धर्म, लिंग के आधार पर भेदभाव है । मगर यह भेदभाव मानसिक ज्यादा है । जबतक मानसिक रूप से भेदभाव ख़त्म नहीं होता, तबतक कमज़ोर वर्गों को वास्तविक सम्मान नहीं मिल पायेगा। एससी-एसटी एक्ट या आरक्षण से भेदभाव बढ़ रहा है ना कि कम हो रहा है । हाँ, इस एक्ट के साथ कमज़ोर वर्गों को प्राथमिकता अवश्य मिल रही थी । मगर किन्हीं दो व्यक्तियों में किसी एक को अधिक प्राथमिकता देना संविधान के अनुकूल नहीं है ।
संचार के इस युग में हर वर्ग आगे बढ़ रहा है । स्कूल, कॉलेज से लेकर नौकरी के मामलों में अब किसी के साथ पहले जैसा भेदभाव नहीं दिखता। एससी-एसटी हो या अन्य कमजोर वर्ग मैंने सबको आज सामान्य वर्गों के साथ कदम मिलाते देखा है। अपने आसपास जाति के नाम पर आरक्षण या स्पेशल एक्ट की माँग करने वाले लोगों को तो नहीं देखा,लेकिन उनको हर जगह सामंजस्य बैठाते और मेहनत करते जरूर देखा है । और सामान्य वर्गों को भी उनमें घुलते-मिलते देखा है । फिर वे कौन लोग है जो जातिगत हिंसा को बढ़ावा दे रहें है और भेदभाव के नाम पर लोगों का आपसी सामंजस्य बिगाड़ रहें है ।
आज़ादी के 72 साल बाद सूचना क्रांति के इस युग अगर हम संविधान को दरकिनार कर जाति-धर्म के नाम और भेदभाव और हिंसा बढ़ा रहे है और कुछ विशेष लोगों को लाभ देकर असमानता बढ़ा रहें है तो हमारी शिक्षा और सोच दोनों को धित्कार है । अब तो वह समय है जब वंचितों को संसाधन उपलब्ध कराया जाये और शिक्षा से व्याप्त भेदभाव को समाप्त किया जाये । अगर कहीं भेदभाव हो भी रहा है तो यह भेदभाव हर जाति-धर्म,लिंग के साथ हो रहा है । अच्छा तो यह होगा कि भेदभाव को उजागर करने के स्थान पर आपसी भाईचारे को उजागर किया जाये ताकि भेदभाव का मानसिक बीज पनपने ना पाये ।
कानून सबके लिए एक हो । किसी को विशेष लाभ प्राप्त ना हो। कमजोर वर्गों को सबल करने का रास्ता शिक्षा और संसाधन है । एससी-एसटी एक्ट या आरक्षण से आज भेदभाव तथा असमानता कही अधिक बढ़ रही है । सामान्य वर्गों में यह बात गहराई से उतर रही है कि फलां व्यक्ति की शिक्षा और नौकरी आरक्षण के बदौलत है ना कि योग्यता के आधार पर । और एससी-एसटी कानून के तहत यदि कोई दलित किसी ऊँची जाति पर केस करता है और वह केस झूठा निकलता है तो हमेशा के लिए नीची जाति के लिए घृणा पैदा हो जाती है। जिससे भेदभाव बढ़ता ही जाता है । रही बात एससी-एसटी को कानून को कमजोर करने कि तो दलितों की मसीहा कही जाने वाली मायावती सरकार के दौरान मुख्य सचिव रहे शंभु नाथ ने एक आदेश जारी किया था, जिसमें उन्होंने कहा था कि एक्ट के तहत सिर्फ शिकायत के आधार पर कार्रवाई ना की जाए, बल्कि प्राथमिक जांच में दोषी पाए जाने के बाद ही गिरफ्तारी की जाए। मायावती ने यह फैसला सीएम बनने के ठीक एक हफ्ते के भीतर ही ले लिया था। और कहा था कि एससी-एसटी एक्ट में रेप की शिकायतों पर तब कार्रवाई की जाए जब पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट में बलात्कार की पुष्टि हो जाए और प्रथम जांच में आरोपी दोषी पाया जाए। पुलिस को केवल एससी-एसटी की शिकायत मात्र पर कार्रवाई करने पर रोक लगा दी गयी थी, क्योंकि मायावती काल में निजी बदला चुकाने के लिए इस एक्ट का दुरूपयोग बढ़ गया था । इतना ही नहीं मायावती सरकार ने पुलिस अधिकारियों को आदेश जारी करते हुए कहा था कि एक्ट के तहत अगल कोई गलत शिकायत करते पाया जाता है तो आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 182 के तहत कार्रवाई शुरू की जाए। आईपीसी की धारा 182 किसी जनसेवक से उसके अधिकारों के इस्तेमाल कराकर दूसरे शख्स का नुकसान कराने के मकसद दी जानेवाली फर्जी सूचना से संबंधित है। अतः मायावती सरकार और सुप्रीम कोर्ट दोनों की मंशा फ़र्ज़ी मुकदमों को रोकना और निर्दोषों को बचाना था ना कि अनुसूचित जाति-जनजाति कानून के मूल भाव को नष्ट करना । अब भी न्याय प्रक्रिया में किसी जाति विशेष को कोई हानि नहीं होगी । इसलिए बेवज़ह के दुष्प्रचार को बंद कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत करना चाहिए ।

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