बदला: बहनजी के गुस्से का शिकार हुए नसीमुद्दीन,कांग्रेसनामा पढ़ने की तैयारी में

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लखनऊ: कांग्रेस पार्टी में अपनी एंट्री को धमाकेदार बनाने के लिए नसीमुद्दीन पूरे लाव लश्कर के साथ कांग्रेस से हाथ मिलाएंगे.कांग्रेस मुख्यालय में पार्टी के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद और उत्तर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर की मौजूदगी में नसीमुद्दीन सिद्दीकी कांग्रेसनामा पढ़ेंगे.
एक वक्त था जब नसीमुद्दीन सिद्दीकी बसपा के सबसे बड़ा मुस्लिम चेहरा माने जाते थे. मायावती के राज में उत्तर प्रदेश नसीमुद्दीन की हनक देखने लायक होती थी. बीएसपी के ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्रा के साथ नसीमुद्दीन को जोड़कर मायावती ने मुस्लिम-ब्राह्मण-दलित कॉम्बिनेशन को कभी कामयाबी से आगे बढ़ाया था.

बहनजी के गुस्से का शिकार नसीमुद्दीन:
लेकिन बीते साल मई में सब बदल गया. नसीमुद्दीन को बहनजी के गुस्से का शिकार होना पड़ा. पश्चिम यूपी में टिकट बंटवारे की धांधली के आरोप में मायावती ने उन्हें पार्टी से बर्खास्त कर दिया गया. नसीमुद्दीन और कांग्रेस के बीच सियासी खिचड़ी काफी समय से पक रही थी. नसीमुद्दीन दो बार राहुल गांधी से भी मुलाकात कर चुके हैं. बताया जा रहा है कि नसीमुद्दीन की कांग्रेस में एंट्री के पीछे पार्टी के यूपी इंचार्ज गुलाम नबी आजाद ने अहम भूमिका निभाई है.

कांग्रेस का सामना मोदी एंड कंपनी से:
दरअसल, 2017 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी की बंपर जीत के बाद कांग्रेस को देश के इस सबसे बड़े सूबे में पार्टी की खस्ता हालत का अच्छी तरह अंदाज है. पार्टी को 2019 लोकसभा चुनाव में यूपी की चढ़ाई मुश्किल नजर आ रही है. कांग्रेस का सामना केंद्र में मोदी और यूपी में योगी की जोड़ी का सामना करने की है. ऐसे में वह तमाम ऐसे नेताओं को अपने छत के नीचे लाना चाहती है जो उसका हाथ मजबूत करेंगे. ऐसे में 18 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले उत्तर प्रदेश की सियासी गणित में नसीमुद्दीन सिद्दीकी का कांग्रेस के पाले में आना कांग्रेस को भी सूट करता है.

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नसीमुद्दीन भी पिछले एक साल से उत्तर प्रदेश के सियासी समुंदर में तैरने के लिए जुगत लगा रहे थे. कभी राष्ट्रीय बहुजन मोर्चा बनाया तो कभी समाजवादी पार्टी में भी साइकिल की सवारी करने की सोची. आखिरकार खोज ‘24, अकबर रोड’ पर ही खत्म हुई. आयाराम-गयाराम की पॉलिटिक्स भी देश की एक सच्चाई है तो ये भी हकीकत है कि राजनीति में कोई भी स्थाई तौर पर मित्र या शत्रु नहीं होता. ये देखना दिलचस्प होगा कि अगर आगे चलकर कहीं कांग्रेस के हाथ ने बीएसपी के हाथी का साथ लेने का फैसला किया तो उस स्थिति से सिद्दीकी साहब किस तरह निपटेंगे?

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