कुछ ऐसे थे मेरे दद्दू (स्वर्गीय रामकरण मिश्र)

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उमर 85 साल। हाथ में डंडा। एक सफेद धोती और कुछ उससे मिलता जुलता कुर्ता। पांव में जूता। बाल भले ही कम थे पर हर रोज उन पर सरसों का तेल जरूर चमकता था। सीने में झनझनाहट, हर्रेनियां ,गठिया और न जाने क्या क्या बताते थे… दवाइयां भी खाते थे। बावजूद इसके उम्र के इस पड़ाव पर भी चेहरे पर भरपूर चमक। फुर्ती और जोश बचपने वाला था, कुछ लोगों के कहने के बाद भी हर साल मेले में ठुमके लगाने से बाज नहीं आते थे।…वो कौन सा गाना था ‘जिनके बलम घर मा रहति है’ न जाने क्या क्या।

पूरी महफिल ही लूट लिया करते ​थे। …यूं कहें कि स्टेज पर वह कब आएंगे और ठुमके लगाएंगे इसका सभी को इंतजार रहता था। गुस्सा भी हरदम सातवें आसमान पर रहता था उनका। न गलत करने का इरादा और न गलत सुनने का मादा। किसी से ईर्ष्या नहीं, किसी से दुर्व्यवहार नहीं। जो कुछ कहना है मुंह पर सीधे। डर होता क्या है यह कभी जाना नहीं। हाथ में डंडा हो तो फिर सामने लादेन भी हो तो क्या पिटके ही जाएगा कंफर्म है। किसी काम में भी अगर डट कर खड़े हो गए तो कुछ भी बिगड़े पीछे नहीं हटना। पंचायत का चुनाव हो या कुछ और।

दद्दू अपने मन के मालिक थे जिसके साथ रहते खुलकर। कुछ ऐसे ही थे हमारे दद्दू (बाबा स्वर्गीय रामकरण मिश्र)। उनके स्वर्गवास को चार बरस हो गए, पता ही नहीं चला। गुरुवार को उनका चौथ पाटा था। पूरा परिवार एक साथ। सबने मिलकर उन्हें याद किया। आपका आशीर्वाद स्नेह यूं ही हम सब पर बना रहे। …मेरे दद्दू स्वर्गीय रामकरण मिश्र।

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