जनता की राय: कितना प्रासंगिक है राम मंदिर मुद्दा?

0
215

Lucknow. ऐतिहासिक राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद का मुद्दा एक बार फिर गरम हो गया है। इन सब के बीच इस मुद्दे पर आम जन की राय लेने की कोशिश की। हमने जनता से सवाल किए कि राम मंदिर मुद्दा आज कितना प्रासंगिक है। आइए जानते हैं इस पर लोगों ने क्या प्रतिक्रियाएं दी।

आम जन की प्रतिक्रियाएं

Ajay Mohan
Ajay Mohan

आम जनता की बात करें तो 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी, तब जो पैदा हुए थे, उनकी आयु 25 वर्ष है और आज जिनकी आयु 26 से 30 की है, वे तब इतने छोटे रहे होंगे कि उन्‍हें कुछ याद नहीं होगा। यानी कुल मिलाकर आज के युवा वर्ग को वही पता है, जो उन्‍हें बताया गया है। जिनकी उम्र उस वक्‍त 30 थी, आज 46 हो गई है। इस आयु वर्ग के लोगों के पास यह सोचने का समय नहीं होता कि मंदिर बने या मस्जिद। उनके कंधे पहले ही परिवार की जिम्मेदारियों के नीचे झुक गये हैं। अब मंदिर-मस्जिद का बोझ ये कंधे सह नहीं सकते। यानी कुल मिलाकर इस मुद्दे को हवा देने वाले केवल वे लोग हैं, जिन्‍हें राजनीति चमकानी है। या फिर वे जिन्‍हें सुर्खियों में आना है।

स्मृति ईरानी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को भेजा खत, कहा…

Vinod Kapoor
Vinod Kapoor

राम मंदिर मुद्दा आज भी प्रासंगिक है और जब तक इस पर कोई निष्कर्ष नहीं निकलता तब तक यह प्रासंगिक रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि वह इस मामले में प्रतिदिन सुनवाई करेगा। मुझे लगता है कि बीजेपी 2019 में इसी मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी।
विनोद कपूर

 

 

Awadhesh Mishra

राम मंदिर मुद्दा जन्म से ही प्रासंगिक रहा है। बीजेपी इसको लेकर राजनीति करती रही है। आज भी यह मुद्दा हरा भरा लगता है। श्री श्री रविशंकर की कोशिश हो या फिर शिया वक्फ बोर्ड का सुझाव। हर चीज साफ करती है कि यह मुद्दा आज भी प्रासंगिक है।

 

 

 

Rishi Mishra

राम मंदिर बाबरी मस्जिद विवाद आज उतना प्रासंगिक नहीं है जितना 90 के दशक में था। मगर ऐसा भी नहीं है कि ये मान लिया जाए कि इस पर गंभीरता न बरती जाए। आज सोशल मीडिया ने युवाओं को इस मुद्दे से बहुत अधिक जोड़ दिया है। इसलिए सरकार और सभी पक्षकारों को इस मसले पर गंभीर रहना होगा। बेवजह बयानबाजी से बचना होगा। लोग इस संवेदनशील मुद्दे पर अदालत के फैसले के इंतजार में हैं। बाकी सबको भी इंतजार करना होगा।

 

Anuj Mishra

राम मंदिर मुद्दा हमारी आस्था का विषय है इसे राजनीति से दूर रखना चाहिए ।

 

 

 

 

saurabh sharma

राम मंदिर मुद्दा बहुत प्रासंगिक है। अल्पसंख्यक भी अब यही चाह रहे है कि मंदिर बने और सरकार दूसरे विकासशील कामों पर ध्यान दे, क्योंकि अब केंद्र और राज्य दोनों जगह एक ही सरकार है तो अल्पसंख्यक यानी मुसलमान भी जान चुके हैं कि मस्जिद बनने की राह आसान नहीं और ऐसे में वो मंदिर के लिए ही समर्थन दे रहे हैं।

 

 

suyash mishra

राम मंदिर हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है। इसलिए जब तक यह विवाद किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंचता तब तक इस पर चर्चाएं होती रहेंगी। श्री श्री रविशंकर की पहल और फिर शिया वक्फ बोर्ड का सुझाव के बाद एक बार फिर यह मुद्दा गरम है। हालांकि मामला कोर्ट में है। यह मुद्दा आज भी प्रासंगिक है।

sushant mishra

राम मंदिर मुद्दा आज भी प्रासंगिक है। समय समय पर इस पर राजनीति होती रही है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा हालही में प्रतिदिन इस पर सुनवाई करने की बात कही गई है। उम्मीद है कि जल्द ही इसका हल निकलेगा।

राम मंदिर मुद्दे पर ताजा अपडेट
श्री श्री रविशंकर ने अयोध्या मुद्दे की बातचीत से हल निकालने के लिए मुहिम शुरू की। उन्होंने 16 नवम्बर को यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ से लखनऊ में मुलाकात की थी। इसके दूसरे दिन अयोध्या में उन्होंने साधु-संतों और पक्षकारों से भी मुलाकात की थी। हालांकि उनकी इस मुलाकात के बाद राम जन्मभूमि न्यास के वरिष्ठ सदस्य डॉ रामविलास दास वेदांती ने श्री श्री रविशंकर को षड्यंत्रकारी बताते हुए कहा कि श्री श्री, राम जन्मभूमि को लेकर NGO बनाना चाहते हैं, जिससे राम जन्मभूमि मामला विवादित हो जाए और उसका कोई निर्णय ना हो सके।

वहीं शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में मसौदा पेश किया है। शिया वक्फ बोर्ड के मसौदे के मुताबिक विवादित जगह पर राम मंदिर बनाई जाए और मस्जिद लखनऊ में बने, जिसका का नाम ‘मस्जिद-ए-अमन’ रखा जाए। हालांकि शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के इस मसौदे से मुस्लिम पक्षकार सहमत नहीं हैं।
कब शुरू हुआ विवाद

1528: मुगल शासक बाबर ने यहां एक मस्जिद का निर्माण कराया जिसे बाबरी मस्जिद कहते हैं। हिंदू मान्यता के अनुसार इसी जगह पर भगवान राम का जन्म हुआ था।
1853: हिंदुओं और मुसलमानों के बीच पहली हिंसा हुई।
1859: ब्रिटिश सरकार ने तारों की एक बाड़ खड़ी करके विवादित भूमि के आंतरिक और बाहरी परिसर में मुस्लिमों और हिदुओं को अलग-अलग प्रार्थनाओं की इजाजत दे दी।
1885: मामला पहली बार अदालत में पहुंचा. महंत रघुबर दास ने फैजाबाद अदालत में बाबरी मस्जिद से लगे एक राम मंदिर के निर्माण की इजाजत के लिए अपील दायर की.
23 दिसंबर 1949: करीब 50 हिंदुओं ने मस्जिद के केंद्रीय स्थल पर कथित तौर पर भगवान राम की मूर्ति रख दी. इसके बाद उस स्थान पर हिंदू नियमित रूप से पूजा करने लगे. मुसलमानों ने नमाज पढ़ना बंद कर दिया.
16 जनवरी 1950: गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद अदालत में एक अपील दायर कर रामलला की पूजा-अर्चना की विशेष इजाजत मांगी.
5 दिसंबर 1950: महंत परमहंस रामचंद्र दास ने हिंदू प्रार्थनाएं जारी रखने और बाबरी मस्जिद में राममूर्ति को रखने के लिए मुकदमा दायर किया. मस्जिद को ‘ढांचा’ नाम दिया गया.
17 दिसंबर 1959: निर्मोही अखाड़ा ने विवादित स्थल हस्तांतरित करने के लिए मुकदमा दायर किया.
18 दिसंबर 1961: उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड ने बाबरी मस्जिद के मालिकाना हक के लिए मुकदमा दायर किया.
1984: विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) ने बाबरी मस्जिद के ताले खोलने और राम जन्मस्थान को स्वतंत्र कराने व एक विशाल मंदिर के निर्माण के लिए अभियान शुरू किया. एक समिति का गठन किया गया.
1 फरवरी 1986: फैजाबाद जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल पर हिदुओं को पूजा की इजाजत दी. ताले दोबारा खोले गए. नाराज मुस्लिमों ने विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन किया.
जून 1989: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने वीएचपी को औपचारिक समर्थन देना शुरू करके मंदिर आंदोलन को नया जीवन दे दिया.
1 जुलाई 1989: भगवान रामलला विराजमान नाम से पांचवा मुकदमा दाखिल किया गया।
9 नवंबर 1989: तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार ने बाबरी मस्जिद के नजदीक शिलान्यास की इजाजत दी।
25 सितंबर 1990: बीजेपी अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक रथ यात्रा निकाली, जिसके बाद साम्प्रदायिक दंगे हुए।
नवंबर 1990: आडवाणी को बिहार के समस्तीपुर में गिरफ्तार कर लिया गया. बीजेपी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले लिया।
अक्टूबर 1991: उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह सरकार ने बाबरी मस्जिद के आस-पास की 2.77 एकड़ भूमि को अपने अधिकार में ले लिया।
6 दिसंबर 1992: हजारों की संख्या में कार सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढाह दिया। इसके बाद सांप्रदायिक दंगे हुए. जल्दबाजी में एक अस्थायी राम मंदिर बनाया गया।
16 दिसंबर 1992: मस्जिद की तोड़-फोड़ की जिम्मेदार स्थितियों की जांच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन हुआ.
जनवरी 2002: प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने कार्यालय में एक अयोध्या विभाग शुरू किया, जिसका काम विवाद को सुलझाने के लिए हिंदुओं और मुसलमानों से बातचीत करना था।
अप्रैल 2002: अयोध्या के विवादित स्थल पर मालिकाना हक को लेकर उच्च न्यायालय के तीन जजों की पीठ ने सुनवाई शुरू की।
मार्च-अगस्त 2003: इलाहबाद उच्च न्यायालय के निर्देशों पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने अयोध्या में खुदाई की। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का दावा था कि मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष होने के प्रमाण मिले । मुस्लिमों में इसे लेकर अलग-अलग मत थे।
सितंबर 2003: एक अदालत ने फैसला दिया कि मस्जिद के विध्वंस को उकसाने वाले सात हिंदू नेताओं को सुनवाई के लिए बुलाया जाए।
जुलाई 2009: लिब्रहान आयोग ने गठन के 17 साल बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अपनी रिपोर्ट सौंपी।
28 सितंबर 2010: सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहबाद उच्च न्यायालय को विवादित मामले में फैसला देने से रोकने वाली याचिका खारिज करते हुए फैसले का मार्ग प्रशस्त किया।
30 सितंबर 2010: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित जमीन को तीन हिस्सों में बांटा जिसमें एक हिस्सा राम मंदिर, दूसरा सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े में जमीन बंटी।
9 मई 2011: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी।
जुलाई 2016: बाबरी मामले के सबसे उम्रदराज वादी हाशिम अंसारी का निधन।
21 मार्च 2017: सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से विवाद सुलझाने की बात कही।
19 अप्रैल 2017: सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद गिराए जाने के मामले में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती सहित बीजेपी और आरएसएस के कई नेताओं के खिलाफ आपराधिक केस चलाने का आदेश दिया।

साभार— न्यूजटाइम्स

loading...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here