Video: कैसे खुश होते हैं पितर, क्या है पंचबलि, जान लें पूरी कहानी

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भस्मासुर डेस्क: हमारे शास्त्रों के मुताबिक पितरों को खुश करने के लिए दान पुन्य किया जाता है। साथ ही ब्राम्हणों को भोजन और दक्षिणा दिया जाता है। इसके साथ ही पंचबलि यानी गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटियों को भोजन देना पुण्य माना जाता है। खासतौर से खीर-पूड़ी खिलाई जाती है। ऐसा करने से पितृ देवता खुश होते हैं। भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या तक का समय श्राद्ध व पितृ पक्ष कहलाता है।

1— गोबलि (पत्ते पर) – पश्चिम दिशा की ओर पत्ते पर गाय के लिए खाना निकाला जाता है। कहा जाता है कि मृत्यु होने पर आत्मा को वैतरणी नाम की नदी को पार करना पड़ता है। गरुड़ पुराण में गाय को वैतरणी नदी से पार लगाने वाली कहा गया है। गाय में ही सभी देवता निवास करते हैं।

2— श्वानबलि (पत्ते पर):- इसमें कुत्ते को भी एक हिस्सा निकाला जाता है। कुत्ता यमराज का पशु माना गया है, श्राद्ध का एक अंश इसको देने से यमराज प्रसन्न होते हैं। शिवमहापुराण के अनुसार, कुत्ते को रोटी खिलाते समय बोलना चाहिए कि- यमराज के मार्ग का अनुसरण करने वाले जो श्याम और शबल नाम के दो कुत्ते हैं, मैं उनके लिए यह अन्न का भाग देता हूं। वे इस बलि (भोजन) को ग्रहण करें। इसे कुक्करबलि कहते हैं।

3— काकबलि (पृथ्वी पर)- पंचबली का एक भाग कौओं के लिये छत पर रखा जाता है। गरुड़ पुराण के अनुसार, कौवा यम का प्रतीक होता है, जो दिशाओं का फलित (शुभ-अशुभ संकेत बताने वाला) बताता है। इसलिए श्राद्ध का एक अंश इसे भी दिया जाता है। कौओं को पितरों का स्वरूप भी माना जाता है। श्राद्ध का भोजन कौओं को खिलाने से पितृ देवता प्रसन्न होते हैं और श्राद्ध करने वाले को आशीर्वाद देते हैं।

4— देवादिबलि (पत्ते पर) – देवताओं को भोजन देने के लिए देवादिबलि की जाती है। इसमें पंचबली का एक भाग अग्नि को दिया जाता है जिससे ये देवताओं तक पहुंचता है। पूर्व में मुंह रखकर गाय के गोबर से बने उपलों को जलाकर उसमें घी के साथ भोजन के 5 निवाले अग्नि में डाले जाते हैं। इस तरह देवादिबलि करते हुए देवताओं को भोजन करवाया जाता है। ऐसा करने से पितर भी तृप्त होते हैं।

5— पिपीलिकादिबलि (पत्ते पर) – इसी प्रकार पंचबली का एक हिस्सा चींटियों के लिए उनके बिल के पास रखा जाता है। इस तरह चीटियां और अन्य कीट भोजन के एक हिस्से को खाकर तृप्त होते हैं। इस तरह गाय, कुत्ते, कौवे, चीटियों और देवताओं के तृप्त होने के बाद ब्राह्मण को भोजन दिया जाता है। इन सबके तृप्त होने के बाद ब्रह्मण द्वारा किए गए भोजन से पितृ तृप्त होते हैं।

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