मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग का नोटिस, उपराष्ट्रपति से मिले विपक्षी नेता

0
2804

नई दिल्ली। देश के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए विपक्ष एकजुट हुआ है। कांग्रेस की अगुवाई में सात विपक्षी दलों के नेताओं ने शुक्रवार को राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू से मिलकर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस सौंपा।

महाभियोग प्रस्ताव की चर्चा काफी दिनों से थी। बजट सत्र के दौरान कांग्रेस ने इसकी मुहिम शुरू की थी। कई विपक्षी दलों ने भी उस समय प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए थे, पर मामला थम गया था। एक दिन पूर्व जस्टिस लोया मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के तुरंत बाद विपक्ष ने यह कदम उठाया है।

नोटिस में जस्टिस दीपक मिश्र के खिलाफ पांच आधार गिनाए गए हैं। इनमें पद के दुरुपयोग का आरोप भी शामिल हैं। नोटिस देने से पूर्व नेता विपक्ष गुलाम नबी आजाद के दफ्तर में विपक्षी नेताओं की बैठक हुई। इसके बाद कांग्रेस, एनसीपी और सीपीआई के नेताओं ने उपराष्ट्रपति आवास जाकर वेंकैया नायडू को नोटिस सौंपा। बैठक के बाद संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि हम चाहते थे कि यह दिन कभी न आए। पर मुख्य न्यायाधीश के रवैये की वजह से हम मजबूर हुए हैं।

यह पूछने पर कि उपराष्ट्रपति नोटिस नामंजूर कर देते हैं तो क्या होगा? उन्होंने कहा कि हमारे पास कई और रास्ते हैं। सिब्बल ने कहा, चार जज की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद हम उम्मीद करते थे कि कुछ बदलाव होगा पर नहीं हुआ। विपक्ष के आरोपों की जांच के लिए अगर कमेटी गठित की गई तो मुख्य न्यायाधीश को न्यायिक और प्रशासनिक कार्यो से हटना पड़ेगा।

गुलाम नबी आजाद ने क्या कहा
नोटिस पर 71 सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। इनमें से सात सदस्य सेवानिवृत्त हो गए हैं। ऐसे में सात पार्टियों के 64 सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। कई और सदस्यों का समर्थन भी हासिल है। हालांकि, उन्होंने दस्तखत नहीं किए हैं। –

क्या लगे हैं आरोप

प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट में फायदा लेने का आरोप, इसमें नाम आने के बावजूद उन्होंने मामले का जैसे निपटारा किया, उसमें जांच जरूरी है
परंपरा रही है कि जब मुख्य न्यायाधीश संविधान पीठ में हों तो किसी मामले को दूसरे जज के पास भेजा जाता है। पर, यहां ऐसा नहीं हो रहा।

मुख्य न्यायाधीश जब वकील थे, तो उन्होंने एक फर्जी हलफनामे से जमीन का अधिग्रहण किया। एडीएम ने यह आवंटन 1985 में रद्द कर दिया था। पर इन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जज नियुक्त होने के बाद 2012 में वह जमीन वापस की।

प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट मामले में उन्होंने न्यायिक और प्रशासनिक प्रक्रिया को नजरअंदाज किया। इसकी और जांच होनी चाहिए।

मुख्य न्यायाधीश ने अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया। उन्होंने कई संवेदनशील मामलों को चुनिंदा बेंचों को दिया।

loading...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here