नवरात्रि स्पेशल: यहां मूर्ति की नहीं योनि की होती है पूजा, दी जा​ती है 7 तरह की बलि

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भस्मासुर डेस्क(कामाख्या मंदिर)। एक ऐसा मंदिर जहां मूर्ति की नहीं बल्कि योनि की पूजा होती है। यहां 7 तरह की बलि देने की प्रथा है। यह मंदिर असम की राजधानी दिसपुर के पास गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से 10 किमी दूर ब्रम्हपुत्र नहीं के किनारे नीलांचल पर्वत पर स्थि​त है। इसे कामाख्या मंदिर कहते हैं। यह मंदिर शक्ति की देवी सती का मंदिर है। एक ऊंची पहाड़ी पर यह मंदिर स्थित है।

यह मंदिर तंत्र सिद्धि का सर्वोच्च स्थल है। यह शक्तिपीठ सती के इक्यावन शक्तिपीठों में सर्वोच्च स्थान रखता है। यहीं पर भगवती की महामुद्रा (योनि-कुण्ड) स्थित है।

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पर्वत पर दस सीढ़ी नीचे एक अंधेरी गुफा में योनि मुद्रा पीठ है, जहां दीपक जलता रहता है। इस मंदिर में 15 दिन की दुर्गा पूजा होती है। इसके पीछे एक कहानी है। कहा जाता है कि रावण का वध करने से पहले भगवान राम ने 15 दिनों तक शक्तिपूजा की थी। कृष्ण पक्ष की नवमी से यह पूजा शुरू हो जाती है। नवरात्रि पूजा के दौरान सभी पुजारी मंदिर परिसर में ही रहते हैं। इसे यहां वनवास भी कहा जाता है।

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दी जाती है 7 प्रकार की बलि
इस मंदिर में 7 तरह की बलि दी जाती जिसमें भैंसा, बकरा, कबूतर, मछली, गन्ना और कद्दू शामिल है । दशमी के दिन देवी की फोटो की पूजा के बाद ब्रह्मपुत्र के आम्राजोली घाट (देवियों के घाट) पर इसे विसर्जित किया जाता है।

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भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल में कुल 51 शक्तिपीठ हैं। महाकाल संहिता के अनुसार इनमें 4 आदि शक्तिपीठ हैं, जहां देवी शरीर के प्रमुख अंग गिरे थे। बाकी स्थानों पर अन्य अंग गिरे थे। अगर आपको यह जानकारी अच्छी लगी है तो कृपया इसे शेयर जरूर करें, धन्यवाद।

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