इतनी सस्ती है जिंदगी, मौत के मुहाने पर पुलिसकर्मियों का परिवार

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धरती पर अगर आप नरक लोक के दर्शन करना चाहते हैं तो लखनऊ पुलिस लाइन आइए। आपकी इच्छा पूरी हो जाएगी। 24 घंटे आपकी सेवा में तत्पर रहने वाली राजधानी पुलिस बदतर जीवन जी रही है। एक तरफ पुलिस महकमें के आला अफसर भारी सुरक्षा के बीच वातानुकूलित घरों में मौज से रह रहे हैं। वहीं इन पुलिस के छोटे कर्मचारियों की न तो कोई सुनने वाला है और न ही देखने वाला।

दीवारों ने दरवाजों का साथ छोड़ दिया है। छतें दरारे दे चुकी हंै। प्लास्तर गिर रहा है। बारिस में टपकते पानी ने स्थिति और भयावह बना दी है। डर लगता है, कौन सी बिल्डिंग कब ढह जाए पता नही। कुछ ऐसे मंजर के बीच शहर की सुरक्षा करने वाले पुलिसकर्मियों का परिवार रह रहा है। यकीन नहीं हो रहा है कि जिन्दगी इतनी सस्ती हो गई है। न तो आला अधिकारी इसको लेकर चिंतित हैं और न ही सरकार। लखनऊ पुलिस लाइन का जब हाल जानने की कोशिश की गई तो बदहाल तस्वीर सामने आई। यहां मेंटिनेंस के लिए धन तो आवंटित हो रहा है पर जा कहां रहा है कुछ पता नहीं।

एक तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशभर में हर गरीब को आवास देने में लगे हैं वहीं दूसरी तरफ पुलिसकर्मियों के जर्जर हो चुके सरकारी आवासों की सुध लेने वाला कोई नहीं। हम बात कर रहे हैं राजधानी लखनऊ की जहां अपराधों पर अंकुष लगाने और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए भागदौड़ करने वाली पुलिस खुद माकूल सुविधाओं को तरस रही है। मरम्मत के अभाव में पुलिस लाइन में बने आवास जर्जर हो चुके हैं। दीवारें दरक गई हैं, छतों में दरारे पड़ गई हैं। बरसात में छतों से टपकने वाले पानी ने स्थिति और बिगाड़ दी है। आए दिन जगह-जगह से प्लास्तर गिर रहा है।

घरों में बैठना तक मुश्किल हो गया है। कब कौन सा मकान ढह जाए कोई भरोसा नहीं। पुलिस लाइन में बनी कई बिल्डिंग्स को तो डेड घोषित कर दिया गया है। बावजूद इसके यहां लोग रह रहे हैं, क्योंकि इन्हें ध्वस्त नहीं किया गया। पुलिस को हाईटेक करने के लिए लग्जरी वाहन तो उपलब्ध करा दिए गए, लेकिन जवानों की सुविधाओं के नाम पर कुछ नहीं। पुलिस लाइन का जब भ्रमण किया गया तो आवासों के अलावा कई अव्यवस्थाएं दिखीं, जिनसे जूझते हुए पुलिस लाइन में रह रहे पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं। एक पुलिसकर्मी ने बताया कि कड़ी मशक्कत के बाद अगर किसी को आवास मिलता भी है तो वह भी जर्जर।

इनके रखरखाव मरम्मत के लिए न तो कोई ठोस व्यवस्था की गई है और न ही उच्चाधिकारी इसे लेकर गंभीर हैं। जब भी इसके लिए शिकायत की जाती है तो कहा जाता है कि आवास खाली कर दीजिए। पुलिसकर्मियों के लिए मौजूद आवासों के रखरखाव के लिए कोई सालाना बजट ही प्रस्तावित नहीं है। यही कारण है इनकी स्थिति जर्जर है। जो बजट आता भी है वह कहां जाता है कुछ पता नहीं। तेज आंधी अथवा भूकंप आने पर आवासों की दीवारोें में दरारें पड़ गई हैं। पुलिस लाइन के आवासों की स्थिति इतनी खराब है कि ज्यादातर घरों की छतें टपकती हैं। कई लोगों ने तो अपने निजी पैसों से टीप कराकर इससे निजात पा ली है वहीं कई घर ऐसे हैं जहां छतों से पानी टपक रहा है। पुलिस लाइन के भ्रमण के दौरान देखा तो छतों पर लोगों ने पाॅलीथीन डाल रखी थी। पूछने पर पता चला तो बरसात में पानी की टपकन से बचने के लिए ऐसा किया गया। बावजूद इसके खाकी की सुरक्षा पर ध्यान देने वाला कोई नहीं है।

नालियों में सिल्ट जमा हो गई है, गलियों में जमी घास सच्चाई खुद ब खुद बया कर रही है कि स्थिति कितनी बदतर है। मकानों की छतों पर काई लग चुकी है। सबकी सुरक्षा का जिम्मा उठाने वाले पुलिसकर्मी नरकीय जीवन जी रहे हैं। हालही में भवन गिरने से चार लोगो की मौत की घटना के बाद से पुलिसकर्मियों में डर बना हुआ है। वह हर वक्त किसी अनहोनी को लेकर भयभीत हैं। पुलिस लाइन में तकरीबन 700 से ज्यादा जर्जर आवासों और कंडम हो चुकीं 10 बैरकों की मरम्मत के लिए कोई ठोस पहल नहीं हुई। एक दरोगा ने बताया कि अप्रैल 2015 में भूकंप आने के बाद कई हफ्ते नींद नहीं आई। ड्यूटी के वक्त भी परिवार की चिंता रहती है। कब क्या हो जाए कुछ भरोसा नहीं। पिछले दिनों लखनऊ में लगातार बारिस के चलते कई मकान और बिल्डिंग्स के गिरने की खबरें आईं। इसमें 3 लोगों की मौत भी हुई। राजधानी में पुलिसकर्मियों को मिलने वाला मकान किराया भत्ता उनके गुजारे के लिए नाकाफी है।

दरअसल पुलिसकर्मियों को उनके पेस्केल के हिसाब से भत्ता दिया जाता है। इनमें सिपाही को तकरीबन 1500 तथा दरोगा को 2500 रुपए के करीब मिलता है। ऐसे में जिन पुलिसकर्मियों को सरकारी आवास नहीं मिल पाता है उन्हें मकान किराया भत्ता से गुजारा करना मुश्किल साबित होता है। पुलिसलाइन में करीब 1350 पुलिसकर्मियों के लिए आवास बने हुए हैं। इनमें से अधिकांश की हालत दयनीय है। यही नहीं तकरीबन 3000 से अधिक ऐसे पुलिसकर्मी भी हैं जिन्हें अवास आवंटित नहीं हुआ है। ऐसे में वह ऊंची दरों पर किराए के मकानों में रह रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि ऐसी परिस्थितियों में हम पुलिस से कैसे उम्मीद करें कि वह तनावमुक्त रहे। जब उसका परिवार खुद असुरक्षित है, कठिनाइयों से गुजर रहा है अभावों में जी रहा है।

अगस्त महीने में लखनऊ में हुईं घटनाएं
गणेशगंज इलाके में एक बिल्डिंग गिरने से एक बच्ची की मौत हो गई थी।
हुसैनगंज में इमारत के गिरने से 2 लोगों की मौत, तीन लोग घायल हुए।
लखनऊ के अमीनाबाद में बिल्डिंग गिरी, लेकिन कोई नुकसान नहीं हुआ।
लालकुआं में एक बिल्डिंग गिरी इसमें आठ साल की एक बच्ची घायल हो गई है।
उदयगंज के पास एक इमारत गिर गई इसमें चार लोगों को बचाया गया है।

मुश्किल से मिलता है मकान
एक पुलिसकर्मी ने बताया कि हमे रहने के लिए जो आवास भत्ता मिलता है वह काफी कम है जिससे बाहर किराए पर घर लेकर गुजर करना मुश्किल है इसलिए कोशिश रहती है कि पुलिस लाइन में मकान मिल जाए। लेकिन आवास न होने के चलते काफी मशक्कत करनी पड़ती है।

क्या कहा आरआई ने
रिजर्व पुलिस लाइन लखनऊ के इंचार्ज एमपी सिंह ने कहा कि आवास से संबंधित किसी भी जानकारी देने के लिए उच्च अधिकारी हैं। कितने आवास जर्जर हैं, कितने नए बने हैं और कितने बनने वाले हैं इससे जुड़ी कोई भी जानकारी मेरे पास नहीं है।

भूकंप से लगता है डर
एक पुलिसकर्मी ने बताया कि अप्रैल 2015 में भूकंप ने राजधानी लखनऊ समेत कई इलाकों में दहशत बना दी थी। आज भी डर लगता है कि कहीं फिर से भूकंप न आ जाए, क्योंकि इन आवासों में अब इतना दम नहीं बचा कि यह भूकंप को दोबारा झेल सके।

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