Saturday, September 22, 2018

कालाकांडी : जो सबसे बड़ा कांड यह करती है कि सैफ़ की बेमिसाल परफ़ॉर्मेंस को ज़ाया कर देती है

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कालाकांडी में सैफ़ अली ख़ान का किरदार यह भी साबित करता है कि डार्क फिल्में ही उनकी प्रतिभा के साथ पूरा न्याय कर सकती हैं।

@संकल्प सिंह।

निर्देशक : अक्षत वर्मा

लेखक : अक्षत वर्मा, देवेश कपूर

कलाकार : सैफ अली खान, दीपक डोबरियाल, विजय राज, सोभिता धुलीपाला, अक्षय ओबरॉय, कुणाल रॉय कपूर, ईशा तलवार, नील भूपालम, शिनाज ट्रेजरी

रेटिंग : 2 / 5

तो जनाब,‘कालाकांडी’ ऐसी धमाल वयस्क फिल्म है जिसे अपने अतिव्यस्त जीवन में समय निकालकर आपको अवश्य देखना चाहिए – काश कि हम ऐसा कह पाते!

निराश ज्यादा करने वाली ‘कालाकांडी’ असल में, टुकड़ों में बेहद लुत्फ देने वाला सिनेमा है. लेकिन अपनी संपूर्णता में यह निराश करने वाली फीचर फिल्म है. फिल्म में तीन मुख्तलिफ कहानियां हैं जो आपस में नहीं टकरातीं और ज्यादातर वक्त अलग-अलग रास्तों पर ही चलती हैं. इन तीन कहानियों में से विजय राज व दीपक डोबरियाल वाली अपने ही बॉस का पैसा चुराने की कहानी और सोभिता धुलीपाला व कुणाल रॉय कपूर वाली प्रेमियों के मसाइलों की कहानी बेहद साधारण हैं, और सिर्फ कैंसरग्रस्त सैफ अली खान वाली एक रात में खुलकर जिंदगी जीने की कहानी लाजवाब.

न सिर्फ साधारण बल्कि एक वक्त बाद आपको इन समानांतर चलती दो कहानियों के इस महत्वाकांक्षी फीचर फिल्म में होने का मकसद भी समझ नहीं आता. ‘देल्ही बेली’ जैसी स्मार्ट फिल्म लिखने के बाद एक बार फिर से पागलपन में सराबोर ब्लैक कॉमेडी विधा को साधने चले अक्षत वर्मा – इस बार निर्देशक बनकर – शुरुआत में तो दिलचस्प संवादों और अजीबोगरीब सिचुएशन्स के दम पर इन कहानियों को रोचक बनाए रखते हैं लेकिन इंटरवल के बाद न इन कहानियों के आंतरिक द्वंद प्रभावित करते हैं और न ही इनके नीरस क्लाइमेक्स. जो भी घटता है (जिसे यहां बताकर आपका मजा खराब करने का हमारा कोई मकसद नहीं) वो सैफ अली खान वाली कहानी से बीस हाथ बराबर कमतर होता है. चूंकि निर्देशक सैफ वाली कहानी का थोड़ा सा बेमिसाल हिस्सा दिखाकर दूसरी पर कट करते हैं, और फिर तुरंत तीसरी पर, इसलिए सामने ही साफ-साफ नजर आ जाता है कि कौन कितना हमारा समय व्यर्थ कर रहा है.

ऐसा नहीं है कि किरदार इस बार अक्षत वर्मा ने ‘देल्ही बेली’ की तरह बेमिसाल की लीक वाले विचित्र नहीं गढ़े. तकरीबन सभी पात्र अपनी विचित्रता से आपको आकर्षित करते हैं. एक फीरोज खान प्रेमी गैंगस्टर उनकी तरह काऊबॉय बनने के चक्कर में खुद को गलत जगह गोली मार लेता है और जो चीजें शरीर में दो होनी चाहिए, उसके पास एक ही बचती है. इस गैंगस्टर के दो गुर्गे – बाकमाल विजय राज और दीपक डोबरियाल – हर वाक्य की शुरुआत और अंत गालियों से करते हैं और जमकर बकैती करते हैं.

फिल्मों में लगातार ईमानदार काम कर रहे अक्षय ओबरॉय लेडीज पर गिरने की जगह टीवी पर गिरने की आदत रखते हैं तो एक पुलिसवाला मोटापे की वजह से भाग नहीं पाता और सैफ अली खान के साथ एक बेहतरीन सीक्वेंस साझा करता है. शिनाज ट्रेजरी, जिन्हें बॉलीवुड कभी अच्छे रोल नहीं देता, ‘देल्ही बेली’ के बाद एक बार फिर अपने किरदार (नशे में रहने वाली दोस्त) को खूब मनोयोग से अभिनीत करती हैं और एक किन्नर वेश्या तो फिल्म को उसकी सबसे मजेदार घटनाएं देती है.

लेकिन ‘इस रात की सुबह नहीं’ और ‘एक चालीस की लास्ट लोकल’ जैसी उम्दा फिल्मों की तरह एक रात की कहानी कहने वाली ‘कालाकांडी’ की पटकथा के पास इन किरदारों से न्याय करने वाली रोचकता सदैव नहीं रहती. जो बात ‘देल्ही बेली’ को खास बनाती थी, वही यहां गायब नजर आती है. कहने को कालाकांडी एक मराठी गाली है जिसका हिंदी में अर्थ भसड़ मचना जैसा कुछ होता है. लेकिन फिल्म में यह क्रिया कम ही अंजाम दी जाती है.

अजीबो-गरीब किरदारों और विचित्र सिचुएशन्स को स्थापित करने के बाद इंटरवल के बाद वाले हिस्से में फिल्म दिशाहीन हो जाती है और कुछ ठहाके देकर व कभी-कभार अपनी विचित्रता से चौंका देने के अलावा फिल्म की कहानी के पास कुछ खास नहीं बचता. सैफ अली खान के अलावा, जो पहले सीन से लेकर अंतिम सीन तक फिल्म को दर्शनीय बनाए रखने की भरसक कोशिश करते हैं.

फिल्म में सैफ के किरदार का नाम आखिर में पता चलता है और उससे पहले तक दर्शकों के लिए बेनाम रहा यह किरदार साबित कर देता है कि डार्क फिल्में ही सैफ अली खान की प्रतिभा के साथ संपूर्ण न्याय कर सकती हैं. कैंसर की वजह से कुछ वक्त बाद ही मरने वाला उनका किरदार लाल सितारे के रंग-रूप वाली ड्रग्स लेकर पुन: जीवित महसूस करता है और फिर वो चीजें करना शुरू कर देता है जो उस जैसा ‘गुड बॉय’ वैसे कभी नहीं करता.

और जब पहली बार इस खतरनाक ड्रग्स का असर शुरू होता है, तब सैफ का अभिनय देखने लायक होता है! अगर आपको पता है, या आपने किस्से-कहानियों में सुना-पढ़ा है, कि एक शांत-चित्त इंसान को एलएसडी या ऐसी ही कोई ड्रग्स कैसा फील कराती है, कैसी ‘हाई’ देती है, तो आप सैफ की एक्टिंग देखकर उसके इतने ज्यादा वास्तविकता के करीब होने पर वाह कर उठेंगे. साथ ही अक्षत वर्मा ने भी अनूठे वीएफएक्स की मदद लेकर उस ‘हाई’ को बेहद दर्शनीय बनाया है और कभी व्हेल, प्लेन देखकर तो कभी टूटे हुए तारे को हाथ में देखकर आप उनकी कल्पनाशीलता के मुरीद बनेंगे ही बनेंगे.

टूटकर अभिनय करने वाले सैफ के अभिनय के मुरीद इसलिए ज्यादा बनेंगे कि फिल्म में वे कई सारे इमोशन्स सहजता से इमोट कर लेते हैं. जब जरूरत होती है तब जबरदस्त कॉमिक टाइमिंग दिखाते हैं, जब ड्रग्स के नशे में अजीबो-गरीब चीजें करनी होती हैं तो गजब का पागलपन धारण कर लेते हैं, बारिश में नाचते हैं तो इतना जबरदस्त कि उनसे आंखें हटाना मुश्किल हो जाता है, और जब मासूमियत से कभी किन्नर कभी वेडिंग फोटोग्राफर (ईशा तलवार) से बात करते हैं तो आप पसीजे बिना रह नहीं पाते. क्योंकि मौत के एकदम करीब खड़े इंसान का दुख वे झटके में आत्मसात कर लेते हैं.

लेकिन अफसोस, फिल्म उनकी परफॉर्मेंस की टक्कर का खुद को नहीं बना पाती. और जैसा कि सिनेमा के ज्ञानी कह गए हैं कि कोई भी परफॉर्मेंस फिल्म से बढ़कर नहीं होती, फिल्म अगर अच्छी नहीं होगी तो अद्भुत अभिनय भी आगे चलकर याद नहीं रखा जाएगा. आजकल ऐसा हमारे यहां हो भी खूब रहा है, कंगना रनोट का खूबसूरत अभिनय ‘सिमरन’ में जाया हुआ तो विद्या बालन का साल 2017 का सर्वश्रेष्ठ अभिनय सिर्फ इसलिए लंबे अरसे तक याद नहीं किया जाएगा क्योंकि जिस फिल्म में वो था, वह ‘तुम्हारी सुलु’ एक बेहतरीन फिल्म नहीं थी.

‘कालाकांडी’ ने भी यही सबसे बड़ा कांड किया. खुद को बेहतर फिल्म नहीं बनाया.

 

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