मनुष्य जो बोता है वही काटता है

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”बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय” शायद ये पंक्ति गौतम बुद्ध की ही है। किसी की भी हो बहरहाल मुझे बहुत पसंद है। …और वर्तमान में पा​किस्तान पर सटीक बैठती है। दोस्तों! उद्देश्य बिल्कुल मजाक उड़ाने का नहीं है, क्योंकि एक जमाने में हम सभी छुआ छूत से ग्रसित थे। इसलिए अपने दामन में झांकने के उपरांत हम आप सभी को खुद मैलेपन का अहसास हो जाएगा। बहरहाल आज हमने जातिपात की दीवारें तोड़ने में बहुत हद तक सफलता पा ली। जाति से ब्राम्हण हूं तो क्या हुआ प्रेम से कोई भी पूछता है तो मैं भी साफ सफाई देखकर पल्थी जमा देता हूं। हमारी मित्र मंडली में ही इस बात पर मुहर लगाने वाले कई लोग शामिल हैं।

हमारा तो बचपन ही ज्यादातर मुस्लिम परिवार के बीच बीता। बहरहाल, बीते गुरुवार को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को टीवी पर हांथ जोड़कर घड़ियाली आंसू रोते देखा। थोड़ा गुस्सा आया, फिर पता नहीं क्यों हमदर्दी सी लगी, क्योंकि मामला आतंकियों का नहीं वहां की आवाम की सुरक्षा से जुड़ा था। आज वही अलगाववादी, कट्टरपंथी इमरान सरकार के ही खिलाफ नहीं आ गए बल्कि सेना और कोर्ट के खिलाफ भी हो गए हैं। जिन्हें उकसाकर कश्मीर में उन्माद फैलाया जाता है। आज वही उन्मादी इमरान सरकार के लिए ऐसे नासूर बन गए हैं। जिन्हें खत्म करना या रोकना इतना आसान नहीं। महज एक गिलास पानी के एवज में 8 साल से ईशनिंदा मामले में जेल में बंद आसिया बीवी की रिहाई न जाने उनको क्योंं नहीं पच रही। जबकि खुद सुप्रीम कोर्ट ने उसे बाइज्जत बरी करने के आदेश दिए। ये जाहिलियत नहीं तो और क्या है।

कौन सा धर्म है जो प्यासे को पानी पिलाने से रोकता है। अगर ऐसा कोई धर्म है तो मैं उसे नहीं मानता। हमारे तो कई मुस्लिम मित्र हैं जो कहते हैं कि ईश्वर एक है। जिससे हमे ऊर्जा मिलती है… फला फला। अगर मुस्लिम यह मानते हैं कि सृष्टि की रचना अल्लाह ने की है उसी ने सभी इंसान बनाएं तो फिर इस लिहाज से हर सिख, ईसाई, हिंदू उसका भाई है। यही बात ​हिंदू, सिख और ईसाइयों पर लागू होती है। अगर आप अपने भगवान को सच्चे दिल से मानते हैं तो फिर सामने वाला इंसान आपका भाई ही है उसी भगवान ने उसे बनाया, जिसने तुम्हे बनाया। अगर ऐसी भावना होती तो आज महज एक गिलास पानी के लिए कोई आसिया बीवी 8 साल सलाखों के पीछे न होती।

(ये मेरे निजी विचार हैं, हो सकता है कुछ हद तक मैं सही हूं, या बिल्कुल गलत। फिर भी इसे किसी जाति या धर्म से न जोड़ा जाए)—सुयश मिश्रा

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