Hello! हम विकास दुबे बोल रहे हैं, कानपुर वाले

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आतंक फइलाव तौ मौलाना साद की तरह चुप्पे कोरंटीन होई जाव। कोईक ढूढ़हे न मिलव जो कहूं दूबे की तरह फड़फड़ाएव तौ ठांय ठाय सीधे परलोक जइहौ।

नीचे वीडियो में देखिए खास बातचीत (suyash mishra के यूट्यूब पर ऐसे ही धमाकेदार वीडियो के लिए चैनल तक पहुंचे।)

नमस्कार !👏
अरे वही कानपुर वाले, पांच लाख के इनामी , आठ पुलिस वालेन की मौत के जिम्मेदार। अब तौ पहिचान गयेव।
भइहा हमका मरे कई घंटा होई गए, लेकिन अबही तक नरक के अंदर हमका प्रवेश तक नाई मिला। होल्डिंग एरिया मां हमका बेटिंग करावा जा रहा है। चूंकि हमरे कर्मन की लिस्ट थोड़ी ज्यादा बड़ी है तो हिसाब किताब मा थोड़ी और देर लगी। अब हियां हमार कोई जुगाड़ उगाड़ तौ है नहीं। बहरहाल हमरी चार्जशीट पर चर्चा परिचर्चा होई रही है तौ खाली समय मा हमहूं सोचेन की तुम लोगन से बातियाए लेई। उ का है कि नीचै ससुर मौकेै नाई मिला।

वीडियो में देखिए खास बातचीत
बहरहाल लेह से बिकरू पहुंची मीडिया ने हमको वर्ल्ड फेसम बना दिया। न्यूज चैनलन मा हमरे लिए डिवेट चल रही है हमरे एनकाउंटर के बाद तरह तरह के सवाल उठ रहे हैं। हर तीसरा आदमी एनकाउंटर स्पेलिस्ट बनके ज्ञान पांडे हुआ जा रहा है। अब लोग पूछि रहे हैं कि हमरे हथकड़ी काहे नही लगी थी ? हम सफारी से टीयूवी में कैसे पहुंचे ? हमरी बुलेटप्रुफ जैकेट कहाँ थी ? गाड़ी के सारे पुलिस वाले एक साथ कैसे बेहोश हो गये ..? जब हम भाग रहे थे तो हमारे सीने में कैसे गोलियां लगी ..? जब हम सरेंडर कर दीये थे तो भागे क्यों ..? मीडिया को पहले ही क्यों रोका गया ..? गाड़ी पलटै के बाद उमा एकौ निशान काहे नाई आए..? गाड़ी भैसों ने उलट दी या बारिश ने ..? कहा तौ यहौ जा रहा है कि हमने पुलिस की गोली से ही पुलिस वालों को घायल कर दिया। बहरहाल जित्ते मुंह उत्ती बातें। लेकिन हमरे जैसे दुर्दांत अपराधिन का अपनी मौत के बारे में दुहाई देने का हक नाई है। क्योंकि हम भी जीका जीका मारेन तौ कौन सी नीति अनीति देखेने? हमरे जेसे दुर्दांत का मारेम कोई नीति अनीति नहीं। त्रेता युग मां भगवान राम जब बाली का मारिन तौ कौन सी नीति अनीति देखिन। जब रावण की नाभी मां अमृत रहै विभीषण भेद दिहिस भगवान कौन नीति अनीति देखिन। मतलब साफ है कि भगवान कहति हैं कि दानव का मारेम कोई नीति अनीति नय। हमार कहेक मतलब है कि अपराधी मतलब अपराधी चाहे हिंदू होय मुस्लिम होय सिख होय या इसाई। अगर कोई अपराधिव का जाति धर्म के चश्मा से देखै तो उइका अलग-थलग करो, हम तौ कहिति है पाकिस्तान भेज देव। अपराध की सजा मा कौन नीति अनीति।

अब देखव अंत समय मां हमहूं बड़े बड़े दरबार मा हाजिरी देहेने इहां तक महाकाल के दरबार में सरण मांगेन लेकिन हमरे पाप का घड़ा भरिगा रहय। हमरा अंत तौ निश्चित रहय। हमरी मौत के बाद धरती पर खूब जश्न मना। इ सब देखि कै पहले तो ख़ुशी हुयी की देखो कित्ती दहशत थी हमरी और फिर गुस्सा भी आया की “ कि मौत का कोई कैसे जश्न मना सकता है।? का होगा इस देश की न्यायपालिका और सिस्टम का .. ? “ फिर याद आया हम तौ खुद इस न्यायपालिका और सिस्टम की कई बार हत्या करेन तो फिर गुस्सा कैसा .?

लोग कहि रहें हैं कि मैं बहुत से सवालों के जवाब दिए बिना ही मर गया . हाँ ! ये सच हैं कि मैं बहुत कुछ ऐसा जानता था जो कई पार्टियों के नेताओं के लिए खतरनाक हो सकता था . पर सच बताइये मैं बोलता भी तो कौन सुनता वही तंत्र ..? आज भी कौन नहीं जानता मेरे आकाओं को ..? वैसे भी मेरे बोल देने से भी क्या होता ..?

बहुत हो गये आपके सवाल , अब मैं कुछ सवाल करता हूँ आप से हो सके तो जवाब देना ..

. मैं स्वीकार करता हूँ की मैं हत्यारा , दुर्दांत दुबे बना . अनगिनत गलत काम किये . लेकिन क्या इसके लियें सिर्फ मैं जिम्मेदार हूँ ..?

. क्या इसके लिये मेरा परिवार जिम्मेदार न था ,जिसने पहले आपराध के बाद मुझे रोका नहीं. बल्कि वो अकड़ से घूम-घूम खुदको की विकास दुबे का रिश्तेदार बताते रहे ..?

. क्या इसके लिये बड़े बड़े वो नेता जिम्मेदार नहीं हैं जिन्हें कभी आपने विधायक , कभी सांसद , कभी व्यपारी नेता , और कभी मंत्री बनाया और जिनके लिए मैं वोट छापने वाली मशीन था ..?

. क्या इसके लिए वो पूर्व मुख्यमंत्री जिन से मैं बिना समय लिये डायरेक्ट मिला करता था और जिनका मेरी पीठ पर हाथ था वो जिम्मेदार नहीं हैं ..?

. क्या वो दर्जनों वर्दी वाले और सैकड़ों लोग जिम्मेदार नहीं हैं जिनके सामने मैंने शुक्ला गुरु को थाने के गेट पर मारा पर कोई मेरे खिलाफ गवाही न दे सका ..?

. आधिकारियों से ज्यादा मुझ जैसे जघन्य आपराधी से सलाम ठोक कर , मेरे पैर छू कर बार बार ये “पंडितजी आप ही सबकुछ हैं .. “ का एहसास दिलाने वाले पुलिसकर्मीयों को मैं क्यों न जिम्मेदार कहूँ ..?

. क्या कदम कदम पर वर्दी की ही मुखबिरी करने वाले वर्दी वालों की भी गाड़ी कभी पलटेगी ..? या आठ पुलिसकर्मियों की हत्या में वो मुझसे कम जिम्मेदार हैं ?

 

. क्या वो व्यापारी या उद्योगपति जिन्होंने कभी अपना व्यपार तो कभी अपनी जान बचाने के लियें मेरी हर नजायज मांग पूरी की उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं ?

. या आप जनता जिम्मेदार नहीं हैं जिन्होंने बड़ी आसानी से मेरी हुकूमत स्वीकार कर जुबान सिल ली ? कभी मुझे गरीबों का मसीहा मानने लगे तो कभी अपना नेता . आपने कभी आवाज क्यों नहीं उठाई की आपको आपराधी विकास नहीं अपना विकास चाहियें ..?

. मेरा सबसे बड़ा सवाल देश की न्यायपालिका और संविधान के जिम्मेदारां से हैं , जिसने बड़ी आसानी से मुझे न सिर्फ जमानत दी बल्कि अपने अनुच्छेदों के छेद दिखा कर कुछ भी करने का मौक़ा दिया .

मेरी मौत पर आम जनता जो मिठाइयाँ बाँट रही है वो कहीं भारत की न्यायपालिका के अंधे होने के साथ साथ आपाहिज हो जाने का संकेत तो नहीं हैं ?

क्योंकि सही गलत से परे जनता जानती हैं यदि मैं अदालत की चौखट तक पहुंच जाता तो सबूत, गवाह , पेशी . लोवर ,हाई ,सुप्रीम कोर्टों का कवच मुझे अजेय बना देता . हो सकता जल्द ही सविधान की शपथ लेकर मुझ पर गोली चलाने वाले इन्हीं पुलिस वालों के साये में महफूज रहकर मैं अपने पीछे घूमती मीडिया को “बाईट “ दे रहा होता .

मेरी मौत का तमाशा तो खत्म हुआ .लेकिन मैं न पहला गुनाहगार हूँ और न अंतिम . आपके बीच अनगिनत विकास पल रहे हैं . हो सके तो उन्हें पहचान लेना . और कुछ बातें याद रखना :

. अंधेरे में धोखे से पुलिस वालों पर गोली चलाने/चलवाने वाला मैं हीरों नहीं बल्कि बहुत बड़ा कायर था और मेरी कायरता ही मेरे आपराध का कारण थी .

. आतंक पर खड़ी लंका का विनाश अवश्य होता हैं

. आपराध , राजनीति , पावर और पैसे के सिंडीकेट का मैं वो दर्पण हूँ जिसमें दिखने वाले हर चेहरे पर दाग ही दाग हैं .

. याद रखना की जिस दिन आपकी संतान कोई छोटा सा गुनाह करके भी यदि कालर खड़ा करके अंगान में आये तो उसके गुनाह को छुपाना नहीं बल्कि उसे ऐसी सजा देना हैं जिस से वो फिर कभी डगमगाएं न , अन्यथा अंत में शायद आप भी मेरे माँ-बाप की तरह उसकी शक्ल से भी नफरत करने लगें।

. हम जैसों की सिर्फ एक जाति होती हैं आपराधी . मेरी जाति खोजने वालों जरा सोचो जो इंसान न बन सका हो वो किसी जाति का रहनुमा क्या बनेगा ..?

. याद रखना की जब तक आप डरते रहेंगे विकास दुबे जैसे मोहरें आप पर राज करते रहेंगे .

बाकी चलता हूँ , भीतर से पुकार हो रही हैं अब मेरे लिये नरक का दरवाजा खुल रहा है। ..और हाँ जब मेरी जांच-वाच का खेल हो तो एक बार प्रदेश की सडकों को भी चेक करवा लेना की ये कैसे पहचान जाती हैं कि कब आपराधी की गाडी पलटानी हैं और कब वादी की ?

दुर्दांत अपराधी दुबे (बिकरू वाला )

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