ना ना करते बबुआ, बुआ से प्यार कर बैठे

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लखनऊ (संकल्प सिंह ) ना-ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे करना था इकरार मगर प्यार तुम्हीं से कर बैठे…। यूपी में राजनीतिक सरगर्मी इतनी तेज बदलती हैं कि उसे पहले से भाप पाना काफी मुश्किल  हो जाता है । अब चाहे राजनीतिक मजबूरी हो या फिर अस्तित्व बचाने की लड़ाई, एक-दूसरे से छत्तीस का आंकड़ा रखने वाले बसपा-सपा एक बार साथ आ ही गए हैं। भाजपा विरोध के नाम पर बसपा ने गोरखपुर व फूलपुर लोकसभा उपचुनाव में सपा उम्मीदवारों को समर्थन देने का एलान कर दिया है। हालांकि इसे 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए पक्के तौर पर महागठबंधन का आगाज नहीं माना जा सकता है।

बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी स्पष्ट कहा है कि यह गठबंधन नहीं है। बावजूद इसके, इन्कार नहीं किया जा सकता है कि इस समर्थन के बहाने भविष्य में विपक्षी एका का बीजारोपण हो गया है। हालांकि इसका अंकुरित होकर बड़े वृक्ष में तब्दील होना परिस्थितियों पर निर्भर है। यह समर्थन एक तरह से अपने-अपने वोटरों को परखने का जरिया भी होगा कि वे इस गठबंधन को स्वीकार करते भी हैं कि नहीं। इसका परिणाम ही तय करेगा कि दोस्ती परवान चढ़ेगी या यहीं पर विराम लग जाएगा।

दरअसल, सपा और बसपा की अलग-अलग कार्यसंस्कृति, अपनी-अपनी प्राथमिकताएं हैं। दोनों के अपने-अपने एजेंडे और वोटों के गणित के समीकरण हैं। दोनों के कार्यकताओं के बीच जमीनी स्तर पर सामंजस्य एवं समन्वय की पेचीदगी जैसे कई सवाल ऐसे हैं जो भाजपा के खिलाफ मोर्चाबंदी के इस बीजारोपण के बड़े वृक्ष के रूप में तब्दील होने की राह में खड़े हैं। इनका जवाब तलाशे बगैर सपा या बसपा के लिए महागठबंधन की संभावनाओं को साकार करना असंभव नहीं तो आसान भी नजर नहीं आता। पूरी तस्वीर तो लोकसभा के इन दो उप-चुनाव के नतीजों के बाद ही साफ हो सकेगी।

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