पढै लिखै कै कौन जरूरत रोजगार कै सुन्दर सूरत, चलो पकोड़ा बेचा जाए

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लखनऊ (संकल्प सिंह): 

आजकल राजनीति इतनी गिर गई है कि जब भी टीवी के समाने बैठता हूँ तो यही खबर आती रहती है कि, किसी ने किसी को अपशब्द कह दिया , किसी ने किसी का अपमान कर दिया। ऐसे संवेदनशील मामले सुन सुनकर हम लोग इतना बोर हो गए हैं कि अब हम लोग ऐसे विवाद मनोरंजन के तौर पर लेते हैं।

ऐसा ही एक नया विवाद आजकल न्यूज़ चैनल की हेडलाइंस में छाया हुआ है  पकौड़ा विवाद

देश में बेरोजगारी की बढ़ती समस्या पर अमित शाह ने तर्क दिया कि, ‘बेरोजगार होने से बेहतर है, पकौड़े बेचना’. अमित शाह के तर्क का मतलब यह हुआ कि, पकौड़े या उस जैसी नाश्ते की दूसरी चीजें बेचने वाले बेरोजगार लोगों को खुद को बेहद भाग्यशाली समझना चाहिए.

इसी पकौड़ा कांड  पर कुछ हास्य व्यंग  की पंक्तियां इस प्रकार हैं

चलौ पकौड़ा बेंचा जाय
चलौ पकौड़ा बेंचा जाय ।।
पढै लिखै कै कौन जरूरत
रोजगार कै सुन्दर सूरत
दुइ सौ रोज कमावा जाय
दिन भर मौज मनावा जाय
कुछौ नही अब सोंचा जाय
चलौ पकौड़ा बेंचा जाय ।।

लिखब पढब कै एसी तैसी
छोलबै घास चरऊबै भैसी
फीस फास कै संकट नाही
इस्कूलन कै झंझट नाही
कोऊ कहूँ न गेंछा जाय
चलौ पकौड़ा बेंचा जाय ।।

चाय बेंचि कै पीएम बनिहौ
पक्का भवा न डीएम बनिहौ
अनपढ रहिहौ मजे मा रहिहौ
ठेलिया लइकै घर घर घुमिहौ
नीक उपाय है सोंचा जाय
चलौ पकौड़ा बेंचा जाय ।।

रोजगार कै नया तरीका
कतना सुंदर भव्य सलीका
का मतलब है डिगरी डिगरा
फर्जिन है युह सारा रगरा
काहे मूड़ खपावा जाय
चलौ पकौड़ा बेंचा जाय ।।

मन कै बात सुना खुब भैवा
उनकै बात गुना खुब भैवा
आजै सच्ची राह देखाइन
रोजगार कै अर्थ बताइन
ठेला आऊ लगवा जाय
चलौ पकौड़ा बेंचा जाय ।।

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