बहन जी का मायावी अंदाज

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संकल्प सिंह:  बसपा बसपा मुखिया मायावती ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। उनकी शिकायत है कि वे दलितों की आवाज संसद में रखने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन सत्ता पक्ष बोलने नहीं दे रहा।

मायावती का मायावी अंदाज भी कम दिलचस्प नहीं रहा है

बात सितंबर 1977 की है। तब मायावती 21 साल थीं। आपातकाल खत्म हो चुका था और उसके बाद हुए चुनावों में जनता पार्टी की सरकार बनी थी। दलितों के हक में आवाज उठाने के लिए इस सरकार ने दिल्ली में तीन दिनी कॉन्फ्रेंस बुलाई थी।

मंच पर सरकार के तमाम दलित नेता बैठे थे और उनसे सामने थे देशभर से आए दलित प्रतिनिधि। इस आयोजन के हीरो थे राजनारायण। राजनारायण वह शख्स हैं, जिन्होंने 1971 में इंदिरा गांधी के खिलाफ रायबरेली से चुनाव लड़ा था और हार गए थे। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी और इंदिरा गांधी का निर्वाचन रद्द हो गया था। फिर 1977 में हुए चुनाव में राजनारायण ने इंदिरा को 50,000 से ज्यादा वोटों से हराया था।

यह बात माया को नहीं हुई बर्दाश्त

राजनारायण मंच पर आए और दलितों की दुर्दशा पर बोले। इस क्रम में वे एक बड़ी गलती कर गए। उन्होंने दलितों को बार-बार हरिजन कहकर संबोधित किया। यह बात मायावती को रास नहीं आई। हालांकि मंच पर बैठे किसी नेता ने इस पर आपत्ति दर्ज नहीं कराई। जब मायावती की बारी आई तो उन्होंने खुलकर विरोध दर्ज कराया। किसी बड़े नेता को नहीं छोड़ा। सबको लताड़ा। मायावती के बोलने से पहले इस मुद्दे पर किसी ने ऊफ तक नहीं किया था, लेकिन जैसे ही माया ने बोलना शुरू किया, सामने बैठे लोगोंं में भी जोश भर गया।

फिर क्या था, मोराजी देसाई सरकार में स्वास्थ्य मंत्री राजनारायण के खिलाफ मुर्दाबाद के नारे लगने लगे। माया मंच से उतरीं तो हीरो की तरह उनका अभिवादन हुआ। बताया हैं कि वहां काशीराम के समर्थक भी मौजूद थे, जिन्होंने इस घटनाक्रम और मायावती की जानकारी उन तक पहुंचाई। बाद में काशीराम ने माया तो अपना सियासी उत्ताराधिकारी बनाया।

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