बैड पत्रकारिता: पार्टी को मिला सहारा, बदले में चैनल हैड बांदा से लड़ेंगे चुनाव

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चुनाव में राजनीतिक दल मीडिया पर धन लुटाते हैं। पार्टियों का प्रचार करने के लिये बरसाती मेढ़क की तरह न्यूज चैनल शुरू होते हैं। इन चैनलों को शुरू करने और दिखाये जानी की करोड़ों की फीस का आधा खर्च राजनीतिक दल उठाते हैं।

ये सब शुरू हो चुका है। इन सबके बीच एक अद्भुत बात ये है कि औद्योगिक घराने के कुछ मीडिया समूह उल्टा राजनीति दल के चुनाव पर खर्च कर रहे हैं। कमिटमेंट ये है कि अबकी बार फिर बन जाये सरकार, तो कर देना मेरी नैया पार। मेरे गुनाह माफ करवा देना। पाप धो देना और मेरे काले को सफेद कर देना।

सियासी दलों से कार्पोरेट की ऐसी शर्त वाली सौदेबाजी कोई नयी बात नहीं। नयी बात ये है कि एक कार्पोरेट मीडिया घराना राजनीतिक दल पर पैसा खर्च करके लोकसभा चुनाव का टिकट भी मांग रहा है।

यानी कार्पोरेट ने अपने पैसे से पहले पत्रकारों को मैनीफेकचरिंग की और अब इन लाइजनर नुमा पत्रकारों को संसद भेजने के लिए पार्टियों का चुनावी प्रचार फाइनेंस किया जा रहा है।

लोकसभा चुनाव से पहले मीडिया, कार्पोरेट और सियासी दलों के बीच खिचड़ी पकने लगी है। कार्पोरेट मीडिया मंथन कर रही है कि कौन सा दल कितना मजबूत है। कौन सत्ता की रेस में आगे निकल सकता है। कौन दल ऐसे हैं जो सफल होंगे और अपने आंचल के छांव में अपनी गोद में बैठा लेंगे, चांदी के चम्मच से सत्ता की मलाई खिलायेंगे। इस आकलन के साथ अपने-अपने दलों को जिताने के लिए झूठी-सच्ची खबरों और विश्लेषणों के माध्यम से धुंआधार चुनाव प्रचार की रणनीति तय हो रही हैं। ना सिर्फ चैनल/अखबारों की खबरें से पार्टी को ओब्लाइज किया जायेगा बल्कि चुनावी खर्च में भी कार्पोरेट जगत पैसा झोंकेगा।
इसमें कुछ नया नहीं है। ये सब हर चुनाव में होता है। जो नया है वो चौकाने वाला है। मसलन तमाम कार्पोरेट मीडिया ग्रुप नेताओं की तरह पाला बदल रहे हैं। पैसा खर्च करने और एकतरफा कवरेज देने के एवज में लोकसभा चुनाव का टिकट भी मांग रहे हैं।
पत्रकारिता से राजनीति की तरफ आना कोई नयी बात नहीं है। चंदन मित्रा से लेकर राजीव शुक्ला, शलभमणि त्रिपाठी, एम जे अकबर और आशुतोष जैसे दर्जनों बड़े पत्रकार विभिन्न पार्टियों में शामिल हुए है। चुनाव भी लड़े हैं और बिना चुनाव लड़े शाट कट से राज्य सभा मेंबर (सांसद) भी बने हैं। लेकिन पहली बार ऐसा हो रहा है कि मीडिया का एक औद्योगिक घराना पैसा खर्च करके अपने चैनल हैड के लिए लोकसभा का टिकट मांग रहा है। ताकि पार्टी अपना कमिटमेंट भूले तो पत्रकार से सांसद बना उसका आदमी वादा याद दिलाता रहे। काला को सफेद करवाने के लिए सरकार का साया बना रहे।

मीडिया में कार्पोरेट घरानों की चमक जगमगाने की संस्कृति पैदा करने वाला ये कार्पोरेट घराना आजकल ‘बीमार पहलवान मीडिया समूह’ कहलाता है। बीमार पहलवान इसे इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये वजन तो आज भी बहुत उठा सकता है लेकिन उठा लिया तो सेबी और ईडी नाम की बीमारी के पंजे में फंस कर ये खत्म हो सकता है। इस ग्रुप के पास दौलत की कमी नहीं लेकिन तकनीकी तौर से नंबर वन तरीके से अपनी दौलत शो नहीं कर सकता है। यही कारण है कि लम्बे समय से ये अपने न्यूज चैनल और अखबार के हजारों कर्मचारियों को वेतन नहीं दे रहा है। देता भी है तो दो-चार महीने में एक महीने की तनख्वाह ही दे पाता है। इसके बावजूद इसने पाला बदल कर एक नये राष्ट्रीय दल पर बाजी लगायी है। ये इस राजनीतिक पार्टी पर पिछले कई महीने से पैसा लगा रहा है। पार्टी की तरफ से कवि सम्मेलनों को इसने प्रायोजित किया। इसके अतिरिक्त राजनीतिक जनसभाओं मेंं भी इसका पैसा लग रहा है। बताया जाता है कि लखनऊ और तमाम लोकसभा क्षेत्रों के चुनावी खर्चों का जिम्मा इस ग्रुप ने ले लिया है। इस ग्रुप के अखबार के संस्करण पांच-सात सौ प्रसार में सिमट गये है। न्यूज चैनल की टीआरपी अर्श से फर्श पर आ गई है। चैनल दिखाया जाना भी लगभग बंद हो गया है। इसके बावजूद ये एक पार्टी विशेष को एकतरफा कवरेज देने और कई लोगों की चैनल यूनिट को भेजने की वफादारी निभा रहा है। पार्टी की नुक्कड़ सभाओं में भी चैनल हैड साहब चले जाते हैं। इनका लोकसभा चुनाव लड़ने का इरादा है। बीमार पहलवान कहे जाने वाले इस कार्पोरेट मीडिया घराने के सताये लोगों की लम्बी कतार है। बताया जाता है कि पार्टी को फाइनेंस करने की सौदेबाजी में चैनल हैड के लिए लोकसभा चुनाव के टिकट की मांग की गई है। बांदा लोकसभा क्षेत्र में हैड साहब छोटी-छोटी सभाओं के डायस पर नजर आते हैं। भाषण देते हैं। सम्मान लेते भी हैं और देते भी हैं।आर्थिक अपराध की जांच करने वाली ईडी, सेबी और तमाम एजेंसियों की जांच के दौरान इस कार्पोरेट घराने के बड़े साहब और कई छोटे साहब जेल की हवा (एसी वाली हवा) भी खा चुके हैं। जेल जाना और जेल से छूटना इनकी दिनचर्या बन चुकी है। सभी पार्टियों की सरकारों से सामंजस्य बनाने में माहिर इस समूह का सबसे मजबूत और पुराना रिश्ता उत्तर प्रदेश की एक क्षेत्रीय पार्टी से रहा था। एक जमाने में सत्तारूढ़ कांग्रेस की केंद सरकार से इनका लम्बा पंगा भी हुआ। नरसिंहा सरकार की खामियों में हस्तक्षेप करते हुए सरकार के खिलाफ अखबार ने लम्बी सिरीज छापी थी। फिर यूपी के क्षेत्रीय दल से बहुत ही नजदीकी रिश्ता लम्बे समय तक रहा। प्रधानमंत्री बनने पर अटल बिहारी वाजपेयी जी पर हेलीकॉप्टर से फूल बरसाने के बाद भी राष्ट्रीय पार्टी ने इस ग्रुप को मुंह नहीं लगाया।पहला मौका है जब उस राष्ट्रीय पार्टी विशेष ने इनसे चुनावी खर्च में भागीदारी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया है।हो सकता है लोकसभा का टिकट भी मिल जाये।
डूबते को तिनके का सहारा चाहिए है। इसलिए अगर ये पार्टी ने दुबारा सत्ता हासिल की तो हो सकता है कि इस ग्रुप के तमाम आर्थिक अपराध धुल जायें और अब कि बार सत्ता का सहारा मिल जाये।
इस कहानी की एक दिलचस्प बात ये कि इसके चैनल हैड/पत्रकार महोदय पत्रकारिता से राजनीति के सफर के अध्यायों में अपना नाम अद्भुत रूप से दर्ज करायेंगे। इनके सहयोगी पत्रकर बताते हैं कि यदि इनको टिकट मिल जाता है तो भी ये ग्रुप में बने रहेंगे और पत्रकारिता करते रहेंगे । यानी पत्रकार भी बने रहेंगे और चुनाव भी लड़ेंगे। पहले तो ये कहते फिर रहे थे कि पर्चा भरने से पहले इस्तीफा दे दूंगा। अब कह रहे हैं कि एक हाथ से लोकसभा चुनाव में जीत का प्रमाणपत्र पकड़ेगे तो दूसरे हाथ से पत्रकारिता की सेवा का त्यागपत्र देंगे।

अजीब बात है। इसी को कहते हैं पत्रकारिता की इज्जत तार-तार कर देना।
(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं )
नावेद शिकोह

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