पूरी कहानी: क्या है भीम आर्मी , कहां से आया है ये रावण

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लखनऊ। चंद्रशेखर आजाद उर्फ रावण ये नाम आज अंजान नहीं। खासकर यूपी की राजनीति में रावण हर किसी की जुबान पर है। हालही में जेल से बाहर आते ही उनके समर्थकों और फॉलोअर्स की खुशी को देखकर एक बार फिर यह जानने की हर किसी की इच्छा हो रही है कि आखिर भीम आर्मी है क्या जिसके दम से ‘रावण’ इतना बड़ा चेहरा बनन गए। इसका उदय कब हुआ? किसने किया? क्या उद्देश्य था? कैसे अचानक यह आर्मी सुर्खियों में आ गई। हम आज आपको इस आर्मी और इसके संस्थापक के बारे में पूरी जानकारी देंगे। बस आप ऐसे ही पढ़ते रहें भस्मासुर डॉट काम।

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भीम आर्मी की पूरी कहानी
‘भारत एकता मिशन’ जो कि ‘भीम आर्मी’ के नाम से यूपी के पश्चिमी जिलों में विख्यात है। कहा जाता है कि इस आर्मी के असली प्रणेता दलित चिंतक सतीश कुमार हैं। 2015 में उन्होंने इसकी स्थापना की थी। बड़े लंबे समय से वह एक ऐसे संगठन बनाने का विचार कर रहे थे जो कि दलितों के उत्थान के लिए काम करे। इसके लिए उन्हें एक युवा नेता जी तलाश थी। उसी समय उन्हें रावण के अंदर वो सभी गुण दिखे और उन्होेंने रावण को भीम आर्मी का अध्यक्ष बनाते हुए पूरी कमान उनके हांथों में दे दी। 2014 में चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ और विनय रतन आर्य ने हाशिए वाले वर्गों के विकास के लिए इसे स्थापित किया। इये मजबूत करने का काम शुरू हुआ एक महाविद्यालय से। दरअसल सहारनपुर में एएचपी कॉलेज नाम का एक महाविद्यालय है। एक जमाने में यहां राजपूतों की तूती बोलती थी। कहा जाता है कि यहां दलितों के साथ समान व्यवहार नहीं किया जाता था। उन्हें अलग बैठाया जाता था। पीने का पानी भी उन्हें अगल ही दिया जाता था। उसी समय चंद्रशेखर ने कॉलेज में दाखिला लिया। कॉलेज में दलितों की ऐसी स्थिति देखकर उन्होंने विरोध किया और फिर वहीं से इस इस आर्मी से जुड़कर दिन ब दिन पॉपुलर होते गए। अक्सर दलितों और राजपूतों में तू तू मैं मैं होती थी। लड़ाई होती रहती थी, इसी बीच दलितों की हिम्मत बढ़ने लगी और राजपूतों का वर्चस्व घटने लगा। यहीं कॉलेज भीम आर्मी को मजबूत बनाने का प्रेरणा केंद्र बना।

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ऐसे मिली भीम आर्मी को पॉपुलारिटी
दलितोंं रक्षा और उनका विकास करने के लिए इस संगठन की स्थापना की गई थी। संगठन का उद्देश्य दलितों के हितों की रक्षा और दलित समुदाय के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देना था। सहारनपुर के भादों गांव में संगठन ने पहला स्कूल भी खोला। घटना सहारनपुर-देहरादून रोड पर बसे घड़कौली गांव की है। घड़कौली गांव के बाहर एक दलित नौजवान अजय कुमार ने एक बोर्ड लगा दिया। इस पर लिखा था- ‘दे ग्रेट चमार’। यह बात ‘दे ग्रेट राजपूताना’ नामक संगठन को नहीं पची। कहा जाता है कि इस संगठन के सदस्यों ने ‘दे ग्रेट चमार’ नामक बोर्ड पर कालिख पोत दी। बात तू-तू, मैं-मैं होते हुए मारपीट में तब्दील हो गयी। इसके बाद गांव में आंबेडकर की मूर्ति पर कालिख पोत दी गयी। इसी बीच किसी ने ‘भीम आर्मी’ के सदस्यों को इसकी सूचना दे दी। इसके बाद ‘भीम आर्मी’ के सदस्य मौके पर पहुंच कर ‘दे ग्रेट राजपूताना’ के सदस्यों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया था।

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दिल्ली में दिखी थी भीम आर्मी की ताकत
5 मई 2017 को सहारनपुर से 25 किलोमीटर दूर शब्बीरपुर गांव में राजपूतों और दलितों के बीच हिंसा हुई थी। इस हिंसा में कथित तौर पर दलितों के 25 घर जला दिए गए थे और एक शख्स की मौत हो गई थी। हालांकि इसमें राजपूतों का भी नुकसान हुआ। इस हिंसा के विरोध में जब प्रदर्शन किया गया तो पुलिस ने 37 लोगों को जेल में डाल दिया और 300 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। इस पूरे मामले के बाद चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में भीम आर्मी ने दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया था। उस वक्त भीम आर्मी के अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद रावण की ताकत देख सभी दंग रह गए थे। दिल्ली के जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में दलितों ने पुलिस कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन किया। चंद्रशेखर ने कहा था कि यदि 37 निर्दोष दलित जमानत पर रिहा किये जाएं, तो वह आत्मसमर्पण कर देंगे।

भीम आर्मी अध्यक्ष चंद्रशेखर को पसंद है ‘रावण’ नाम

चंद्रशेखर का जन्म सहारनपुर में चटमलपुर के पास धडकूलि गांव में हुआ था। देहरादून से विधि में स्नातक चंद्रशेखर खुद को ‘रावण’ कहलाना पसंद करते हैं। इसके पीछे उनका तर्क हैं कि “रावण अपनी बहन शूर्पनखा के अपमान के कारण सीता को उठा लाता है, लेकिन उनका भी सम्मान करता है, उन्हें सम्मान के साथ रखता है। भले ही समाज में रावण का चित्रण नकारात्मक किया जाता रहा हो, लेकिन जो व्यक्ति अपनी बहन के सम्मान के लिए लड़ सकता है और अपना सब कुछ दांव पर लगा सकता है, वह ग़लत कैसे हो सकता है।

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