स्मार्ट गाँव क्यों नहीं?

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डाॅ कमल टाॅवरी ( IAS )
पूर्व सचिव भारत सरकार

समग्र चेतना डेस्क। दोस्तों ! मेरा नाम डॉक्टर कमल टावरी है और मैं अभी 75 साल की उम्र में आ रहा हूँ। अपना जो प्लानिंग कमीशन है, जिसका नाम है नीति आयोग और इसके अलावा भारत सरकार के अलग-अलग डिपार्टमेंट में काम कर चुका हूँ। किताबें लिखी हैं और इस वक्त पूरे भारत और विश्व में घूम कर। “क्या विकल्प हमारी समस्याओं का हो सकता है?” पर अध्ययन और उसको फैलाने का प्रयास चल रहा है।

अब मेरी सबसे बड़ी चिंता का पहलू यह है कि हम जो विकल्प दे रहे हैं, वह जन आंदोलन या भारत के सारे डेढ़ सौ करोड़ लोग, जो अधिकतर गाँव में रहते हैं, उनकी अपेक्षाओं को नजरअंदाज नहीं कर सकते। यह बड़े दुख की बात है कि हमारा नीति आयोग और उसके बड़े बड़े अफसर “शहर को बढ़ाओ और गाँव से लोगों को हटाओ” के नारों को लेकर स्मार्ट सिटी के लिए करोड़ो रुपयों की बर्बादी कर रहे हैं। वास्तव में हमें इस देश की आबोहवा, उसका स्वभाव, उसकी संस्कृति, जीवनशैली को समझना जरूरी है।

बड़े दुख की बात है कि दिल्ली में बड़े-बड़े एयर कंडीशंन दफ्तरों में बैठकर भारत के आम आदमी का भविष्य “वह कैसा जिए और क्या खाए पिए?” निर्धारित किया जा रहा है। वास्तव में यह ऊपर से थोपा जा रहा है। ऐसा लगता है कि उसे केवल 5 साल में एक बार नगर पालिकाओं, ग्राम सभाओं के लिए बराबर वोट देने का हक देकर बाकी विकास की भागीदारी में केवल भिखारी बनाना उसके नसीब में है।

यह बड़ी विडंबना है कि इतने बड़े ज्ञानी, विज्ञानी, परिश्रम वाले देश को हमारी नीतियों ने भिखारी और अपाहिज बना कर छोड़ दिया है। अब चुनौती यह है कि किस तरह जन आंदोलन, जन जागरूकता, जनता के लिए, उसके घर में-गाँव में उसकी सोच और अपेक्षा के अनुरूप रोजगार के संसाधनों के बारे में, उसकी क्षमता को उजागर किया जाए ?

स्पष्ट है कि यह कार्य दिल्ली, मुंबई, लखनऊ या मद्रास, जम्मू के शहरों में ए सी कमरों में बैठकर करने का हक सरकारी अफसरों या अफसर शाहीहू को नहीं है। अब नीति आयोग का यह कहना है कि “शहर बनने चाहिए और गाँव से लोगों को शहरों में आना चाहिए”। प्रश्न है कि इस पर गहराई से समग्र रूप से चिंतन अनिवार्य है। आज जो हमारे बड़े बड़े शहर हैं, आज उनमें शांति व्यवस्था की, रोजगार की, बलात्कार की, मारपीट की, स्लम्स की, बीमारी की क्या हालत है ? किसे मालूम नहीं है ?

ऐसी स्थिति में गाँव को ही “स्मार्ट गाँव” क्यों नहीं किया जाए ? रोजगारपरक उचित इंतजाम गाँव में ही विकसित किए जाएं ? व्यक्ति की योग्यता, क्षमता तथा स्वभाव के अनुसार मौके और अवसर उपलब्ध कराए जाएं ? नीति बनाने के पहले गंभीरता से यह अध्ययन किया जाए कि समाज के लोग और गाँव वाले क्या चाहते हैं ? उस पर समग्र वादी चिंतन करके ही नीति निर्धारण और जनता का पैसा लगाने की नीतियां बनाई जाएँ।

हमारी चुनौती है कि नीति आयोग और भारत सरकार के बड़े बड़े अफसर जनता से कटे हुए हैं और उन्हें जनता की जरूरत का अंदाजा नहीं है और दुख की बात है कि राजनीतिक शक्तियाँ भी इसे समझ नहीं रही हैं। क्या किया जाए, कैसे किया जाए ? यह भी स्पष्ट नहीं है। ऐसे हालात में सारी चिंताओं के समाधान के लिए हमें नए सिरे से विकल्प ढूँढना होगा। अगर हम आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल कर्जे, भ्रष्टाचार तथा सरकार पर निर्भरता छोड़ना नहीं चाहते हैं, तो हमें प्रत्येक व्यक्ति की भागीदारी के कार्यक्रमों को आगे लाना होगा।

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