वो देखों मां कराह रही है…

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ऊधव, सज्जन, राम औतार, धनीराम और भगवानदीन, रामवती के पांच बच्चे हैं। एक जमाना था जब रामवती एकलौती कच्ची कोठरी पर फूस और तिन से बने छप्पर के नीचे जीवन गुजारती थी। रामवती के पति दीनानाथ बहुत ही निर्धन थे और बीमारी से ग्रसित थे। दवाई तो दूर मुफलिसी के चलते कभी कभी तो दोनों पहर सूखी रोटी भी नसीब नहीं होती थी। … पर अपना दूध पिलाकर रामवती ने पांचों बच्चों को कभी भूखे पेट नहीं सोने दिया। तनावग्रस्त जिंदगी के साथ समय बीतता गया, इसी बीच दीनानाथ भी साथ छोड़कर चले गए। अब रामवती पांच बच्चों की एकलौती सहारा थी। कोल्हू में बैल की तरह रामवती हमेशा पिसती रहती पर उफ तक न करती। दूसरों के घरों में बर्तन चौका करने के बाद अपने घर का खाना और पांच बच्चों की देखभाल, सब जिम्मा रामवती का था। हर बुरे वक्त के बाद अच्छे दिन आते ही हैं। रामवती की किस्मत भी इतनी कठोर नहीं थी। समय के साथ दुख के बादल छटे और सुख की बेला आई। रामवती के बच्चे बड़े हुए और अपने पैरों पर खड़े हुए। बड़ा बेटा ऊधव अमेरिका चला गया। सज्जन को सरकारी अफसर की नौकरी मिल गई। राम औतार की शादी में उसकी ससुराल से इतनी जमीन मिली की वह वहीं सेटल हो गया। धनीराम और भगवानदीन ने नेतानगरी की ओर रुख किया और दिल्ली निकल गए। तकरीबन 35 साल की तपस्या के बाद आज रामवती की कच्ची कोठरी और छप्परों ने ईंट की शक्ल ले ली है। घर पर दो बड़े कुत्ते हैं, फुलवारी है, चार पांच कुर्सियां लॉन में पड़ी रहती हैं…गेट के बाहर जब गौर से जाकर आप कान लगाएंगे तो आपको किसी बूढ़ी औरत के खांसने की आवाज आएगी। …मैं आपको बता देता हूं कि यह वही ‘रामवती’ है। …अब उसके शरीर ने उसका साथ देना बंद कर दिया है। वह ठीक से उठ चल तक नहीं पाती। उसे आज जरूरत है ऊधव, सज्जन, राम औतार, धनीराम और भगवानदीन की। जिसे उसने कभी खुद भूखे पेट रहकर अपना दूध पिलाया। वक्त देखिए जनाब! मां को एकलौता छोड़ आज पांचों बेटे अपनी अर्धांगिनियों के साथ मौज कर रहे हैं। इस दृष्य को देखकर इसे उस मां की ब​दकिस्मती कहें या इन बेटों का दुर्भाग्य। यह आप तय करें। …बहरहाल इतना होने के बाद भी रामवती आज भी अपने बच्चों की तरक्की पर खुश है। उसे फक्र है कि उसके पांच —पांच बेटे हैं जो पढ़ लिखकर खूब आगे बढ़ गए हैं। उसका तो जीवन बचपन से संघर्षों से भरा रहा इसलिए उसके लिए यह कुछ नया नहीं। उसे खुशी इस बात की है कि उसकी मौत के बाद कम से कम उसके बेटे उसे अग्नि जरूर देंगे। कमोवेश यह कहानी सच्चाई है इस समाज की। जिसमें सिर्फ सज्जन, रामऔतार ही नहीं, बल्कि, फर्नांडीस, सोहरत अली, परविंदर सिंह भी बराबरी के हिस्सेदार हैं।
अगर आपके मन में कोई टाइटल है तो हमें भेजें हम कहानी लिखेंगे (सुयश मिश्रा)

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