मिशन 2019: अखिलेश का बड़ा इम्तिहान, फेंक दिया है ये पासा

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लखनऊ। समाजवादी पार्टी सीटों के बटवारे में बसपा की जूनियर पार्टनर की भूमिका के लिए भी तैयार है। अखिलेश के लिए यह पहला लोकसभा चुनाव होगा जो उनकी अध्यक्ष होने व रणनीति दोनों का जायजा लेगा। अब उनके सामने चुनौती है कि इन सीटों पर सपा की गैरमौजूदगी से होने वाले नुकसान से कैसे निपटेंगे।

यही नहीं टिकट काटे जाने से नाराज दावेदारों को भाजपा उम्मीदवार बनने से रोकने में उनके कौशल की परीक्षा होगी। भाजपा सपा-बसपा के संभावित बागियों को अपने पाले में करने की रणनीति बना रही है। सपा को इस खतरे का भी अहसास है। सपा-बसपा की कोशिश पिछड़ा, दलित व मुस्लिम वोट जोड़ ऐसा समीकरण देने की है जो भाजपा के हिंदुत्व कार्ड को हल्का का साबित कर दे। यह काम जितना उपचुनाव में आसान दिखा उतना ही मुश्किल आम चुनाव में होगा। इस सच्चाई से विपक्षी दल अनजान नहीं हैं।

अखिलेश की कोशिश है कि समय से पहले ही जनता के सामने एक मजबूत गठजोड़ पेश कर दिया जाए और कार्यकर्ताओं को कुर्बानी के साथ के लिए तैयार कर लिया जाए। गोरखपुर, फूलपुर व कैराना की लोकसभा सीट व नूरपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव विपक्षी एकता की प्रयोगशाला बना और इसी से मजबूत गठबंधन पेश करने की चाह विपक्षी दलों में और बढ़ी है लेकिन सबसे बड़ा सवाल सीटों के बंटवारे का है।

चालीस से कम पर तैयार नहीं होगी बसपा!
सूत्र बताते हैं कि बसपा गठबंधन में चालीस से कम सीटों पर तैयार नहीं है। ऐसे में सपा को बाकी चालीस सीटों में रालोद व कांग्रेस से बात बनने पर हिस्सेदारी देनी होगी। ऐसे में सवाल है कि अगर रालोद, कांग्रेस व अन्य को मिला कर 10 सीटें भी देनी पड़ी तो सपा के हिस्से में 30 सीटें हीं आ पाएंगी। ऐसे में सपा अपने लोगों को कैसे कम सीटों पर राजी कर पाएगी और कैसे अपने लोगों को वोट पार्टनर दल को ट्रांसफर करा पाएगी यह बड़ा सवाल है।

अखिलेश विदेश यात्रा से लौटे, चुनावी तैयारियां तेज
अगले साल की होने वाली सियासी समर के लिए अखिलेश यादव अब पार्टी को तैयार करने में जुट गये हैं। वह बसपा के साथ गठबंधन में जाने से पहले अपने संगठन के पेंच कसने जा रहे हैं । पार्टी उनकी चुनावी रैलियां कराने के लिए भी होमवर्क कर रही है। अखिलेश विदेश यात्रा से लौट आए हैं। इस महीने वह जिलों के दौरे पर निकलेंगे।

समाजवादी पार्टी के सामने मुश्किलें
1. जूनियर पार्टनर की भूमिका स्वीकारने के बाद आगे के चुनावों में उसी हैसियत में बसपा संग रहना
2. बसपा व दूसरे सहयोगी दलों की सीटों पर सपा कार्यकर्ताओं को जंग के लिए तैयार करना
3.टिकट कटने से नाराज लोगों को भाजपा के खेमे में जाने से रोकना

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