पर्यावरण संरक्षण के नए दूत बनते मासूम बच्चे

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पोलैंड में अभी कॉप 24 जलवायु सम्मेलन की बैठक चल रही है । इसी बीच स्वीडन की एक छात्रा ग्रेटा थनबर्ज पिछले चार महीने से स्वीडन की संसद के सामने धरने पर बैठी है । पर्यावरण की खातिर वे स्कूल नहीं जा रही है। इनकी ही तर्ज़ पर अब ऑस्ट्रेलिया के हज़ारो छात्र भी सड़कों पर उतर आये । उनका कहना है कि राजनीतिज्ञ इस तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दे रहे है इसलिए हमें धरती के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी । हालांकि ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री ने विद्यार्थियों को प्रदर्शन की बजाए स्कूल जाकर पढ़ाई करने की सलाह दी, मगर उनकी सलाह का छात्रों पर कोई असर नहीं दिखा। वहाँ प्रदर्शन कर रही एक छात्रा का मानना है कि जब हमारा भविष्य ही सुरक्षित नहीं है तो हम पढ़कर क्या करेंगे ? ऐसे ही तमाम जगहों पर छात्र -छात्राओं का पर्यावरण के लिये प्रदर्शन जारी है।

जलवायु परिवर्तन को लेकर जिस गंभीरता से ये बच्चे सड़कों पर उतरे है उससे यह तो साफ़ है कि वाकही पर्यावरण संरक्षण के नाम पर दुनिया भर में आयोजित हो रहे सैकड़ों सम्मेलनों से कोई ठोस हल अबतक नहीं निकल पाया है । पर्यावरण संरक्षण सिर्फ बयानबाज़ी,भाषणों या सम्मेलनों से संभव नहीं है इसके लिये इसके इतर काम किये जाने की जरुरत है । शायद यही संदेश इन बच्चों द्वारा प्रसाशन को दिया जा रहा है ।

बरहाल, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि अब भी पर्यावरण के लिये सतर्क नहीं हुए तो आने वाला कल बहुत ही भयानक होगा । आईपीसीसी की ताज़ा रिपोर्ट भी वैश्विक तापमान को डेढ़ डिग्री रखने का सुझाव दे चुकी है और इससे ज़्यादा तापमान बढ़ने पर कैसे मानव जाति के विनाश का आगाज़ हो सकता है इसके ऊपर भी कई तथ्यों पर प्रकाश डाल चुकी है । सवाल यह है कि तक़रीबन 48 सालों से वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण के लिये किये जा रहे प्रयासों एवं ताबतोड़ सम्मेलनों से अबतक क्या लाभ हासिल हुआ है । और इस दिशा में कितनी उन्नति हुई है । वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी और बढ़ते वायु प्रदूषण ने यह साफ़ कर दिया है कि अबतक जिस स्तर पर काम होना चाहिए वह नहीं हुआ है । तमाम सम्मलेनों और प्रोटोकॉल महज़ एक औपचारिकता मालूम होती है ।

वैश्विक प्रदूषण में भागीदार एक विकसित देश जो दुनिया के लिये महाशक्ति है अब वह पेरिस में हुए जलवायु समझौते से बाहर निकल चुका है । नतीजतन ऐसा मान लेना ज्यादा उचित है कि विकसित देश अपनी उपभोक्तावादि नीति को ज्यादा तरज़ीह दे रहे है बजाए पर्यावरण संरक्षण के । इससे भी गंभीर बात यह है कि अमेरिका की ही तर्ज पर कुछ साधन संपन्न देश भी अब पर्यावरण संरक्षण की जरुरत नहीं समझ रहे है । वह इसे प्रकृति के ऊपर ही छोड़ कर अपना औधोगिक विकास जारी रखना चाहते है । आश्चर्य है कि ऐसी स्थिति तब बन रही है जब विकसित देशों को क्योटो प्रोटोकॉल के तहत कार्बन कटौती के लिये विकासशील देश को कार्बन क्रेडिट तथा पेरिस समझौते के तहत ऐसे देशों को 2020 के बाद वित्तिय सहायता पहुँचाने का भी दायित्व था ।

ऐसे में माना जा सकता है आर्थिक नुक़सान झेलने के डर से अमेरिका सहित कई देश जलवायु परिवर्तन जैसी चीज़ों को ही नकार रहे है । फिर भी जलवायु परिवर्तन किसी फैसले के इंतज़ार में ठहरने वाली तो बिलकुल भी नहीं है । अतः जलवायु परिवर्तन की विकरालता को देखते हुए अन्य देशों को न सिर्फ़ मिलकर कदम बढ़ाना होगा बल्कि गंभीरता के साथ हक़ीक़त में यथाशीघ्र ठोस उपाय करना ही होगा ।इसके लिये जरुरी है एक मुहीम जो यह दर्शाए की मानवीय क्रियाकलापों से प्रकृति को जो क्षति पहुँची रही है अगर जल्द ही उसकी भरपाई नहीं हुई तो पृथ्वी से मानव जाति का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है । जलवायु परिवर्तन के लिए सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे बच्चे शायद इसकी गंभीरता को महसूस कर चुके है और यह समझ भी चुके है कि विकास के नाम पर सरकारें हवा में प्रदूषण और आने आने वाली पीढ़ियों के नसों में जहर घोलने का कार्य कर रही है ना कि पृथ्वी को बचाने का ठोस उपाय ।

जीवन प्रत्याशा में कमी, बिमारियों का बढ़ता प्रकोप और ग्लेशियरों के पिघलने से बाढ़, तबाही और तूफ़ान जैसी घटनाओं में जिस तरह सालों-साल इज़ाफ़ा हो रहा है उससे यह समझ जाना चाहिए कि खतरे की घंटी बज चुकी है अगर अब भी हम सचेत ना हुए तो भविष्य अंधकारमय हो सकता है । अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हो रहे बड़े -बड़े सम्मेलनों से कितना फायदा हुआ इसका परिणाम सबके सामने है । अब जरुरत है सम्मेलनों में किये जा रहे बातों को अमल में लाने की । और प्रत्येक नागरिक को इसमें सक्रिय जिम्मेदारी निभाने की ।

बचपन से हम सभी को प्रकृति के संरक्षण का पाठ पढ़ाया जाता रहा है और साथ ही जलवायु परिवर्तन से हो रहे नुक़सान से सजग है । बावजूद इसके हमारे भीतर कोई वास्तविक परिवर्तन क्यों नहीं आ पा रहा है ? क्या सरकारें ये पाठ पढ़कर भूल गई या ऐसी पाठों का कोई महत्व नहीं रह गया है ? क्यों सरकारी एजेंडों में पर्यावरण संरक्षण शामिल नहीं। स्वच्छ भारत की जगह स्वच्छ हवा और स्वच्छ पानी की बात कब होगी ?

इसकी एक वजह यह हो सकती है कि पर्यावरण संरक्षण हमारी दिन-प्रतिदिन होने वाली आदतों में शामिल नहीं है । यही वजह है कि पर्यावरण संरक्षण को एक पाठ्यक्रम की तरह हमसब पढ़ते तो जरूर है और परीक्षा पास करने तक याद भी रखते है लेकिन असल जीवन में उसका प्रयोग नहीं करते। प्लास्टिक के प्रयोग से लेकर पानी बर्बाद करने तक की आदत घर-घर में है । क्योंकि यह आदतों में शुमार है और जब तक आर्थिक हानि या बड़ा नुक़सान नहीं होता हमें फ़र्क़ नहीं पड़ता । समझ की कमी और आने वाले खतरों की अनदेखी हमे गर्त में ढकेल सकती है ।

यदि इंसान को एक दिन पानी ना मिले तो उपलब्ध पानी का इस्तेमाल वह सोच समझ कर करता है । मगर यदि पानी दूसरे दिन से मिलने लगे तो उसकी आदत यथावत हो जाती है । इसके लिये पानी की सप्लाई बंद करने की जरुरत नहीं है परंतु सीमित करने की जरुरत अवश्य है ताकि जरूरतमंदों को लाभ मिल सके । जब मुसीबत आयेगी तब देखेंगे या आने वाली पीढ़ी के विषय में मैं क्यों सोचु जैसी सोच और ढुलमुल रवैया आज परेशानी की बड़ी वजह है और इसी रवैये को बदलने की ज्यादा जरुरत है । ऐसा नहीं है कि इस दिशा में काम नहीं हो रहा है । पहले के मुकाबले आज लोग ज्यादा सजग ,जागरूक और संवेदनशील है ।

ऐसे में बच्चों का भी जागरूक, संवेदनशील तथा चिंतनशील होना अच्छी निशानी है । भारत में भी पर्यावरण जैसे मुद्दों पर बच्चो को ज्यादा संवेदनशील बनाने की जरुरत है ताकि आने वाली पीढ़ियों को पर्यावरण संरक्षण के बारे में सोचना ना पड़े बल्कि उनकी आदत में शुमार हो जाये । देखा गया है कि बच्चें प्रकृति की गोद में ज्यादा समय बिताते है और पक्षियों जानवरों एवं पेड़-पौधों से बहुत आत्मियता रखते है । ऐसे में अगर बच्चे पर्यावरण संरक्षण के लिये सड़कों पर आ रहे तो इसमें बुरा क्या है । हमे खुश होना चाहिए की बच्चे किताबों की दुनिया से बाहर निकालकर वास्तविक दुनिया में सकारात्मक बदलाव लाना चाहते है जो कि शायद बड़े और विद्वान् लोग नहीं कर पा रहे है । मेरे हिसाब से पर्यावरण संरक्षण जैसे विषय पर चर्चा में लिये बड़ो एवं विद्वानों के साथ बच्चों को भी शामिल करना चाहिए । क्योंकि बच्चे निष्पक्ष प्रकृति प्रेमी तो होते है ही साथ ही वह नए विचारों के जनक भी होते है । छोटी उम्र में अगर वे पर्यावरण जैसे विषयों को ठीक से समझ लेंगे तो आगे चलकर वह इसका हल निकालने में में भी सहयोगी साबित होंगे । और प्रकृति के संरक्षण में कही ज्यादा जागरूक होंगे ।

आज दुनिया भर में बच्चे जहाँ वेडियो गेम्स ,पोर्न तस्वीरें देखने और जंक फूड खाने में व्यस्त है ,ऐसे में पर्यावरण संरक्षण के लिए कदम उठाने वाले विद्यार्थी प्रेणाश्रोत बन सकते है । भारत में भी बच्चो की ऐसी ही जागरूकता की आवश्यकता है । भले ही वह प्रदर्शन ना करे लेकिन जागरूक रहे की समाज में क्या हो रहा है और उसके लिये क्या कदम उठाया गया । बच्चे भी गलत हो रही चीज़ों का शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराए । इसके लिए एक प्लेटफार्म की जरुरत है जहाँ से उनकी आवाज़ को देश तक पहुँचाया जा सके । आख़िर बच्चे भी समाज का अहम् हिस्सा है और देश का भविष्य है । उन्हें पूरी आजादी है कि वे जैसा चाहते है वैसा ही उनको भविष्य मिले । इसके लिए उनकी आवाज़ न सिर्फ सुना जाना चाहिये बल्कि अमल में भी लाना चाहिए ।

पर्यावरण संरक्षण के लिये जरुरी है कि बच्चे जो पढ़े वह करे भी और समझे भी । वर्तमान परिदृश्य से बच्चों को अवगत कराना उतना ही जरुरी है जितना बड़ो को। ये ठीक बात है कि बच्चों को राजनीति से दूर रखना चाहिए मगर हमारे राजनेता किस दिशा में क्या प्रयास कर रहे है इसकी जानकारी उन्हें भी होनी चाहिए खासकर पर्यावरण,समाज,बच्चों और स्वास्थ्य के बारे में । ताकि आगे चलकर उनकी समझ और विश्लेषण क्षमता और अधिक विकसित हो सके और वह यह समझ सके कि आज जो भी परिवर्तन हो रहा है इसके पीछे असल जिम्मेदार कौन है ।

एक अच्छे राजनीतिज्ञ को भी बच्चों के संपर्क में अवश्य रहना चाहिए । इस संदर्भ में ए पी जे अब्दुल कलाम साहब को याद कर सकते है । बच्चों से हम बहुत कुछ नया सीख सकते है और उनकी समस्या का निराकरण कर बहुत हद तक आने वाली समस्याओं से बच सकते है ।

जब विज्ञान में प्रयोग का महत्व है तो सामाजिक पहलुओं पर क्यों नहीं । सामाजिक जीवन के विकास के लिए सामाजिक गतिविधियों का ज्ञान जरुरी है और उसपर कार्य किया जाना भी । इसका सीधा असर जीवन तथा व्यक्तित्व पर पड़ता है । आज वह समय है कि बच्चे मुखर बने,अपनी बात मंच पर तक पहुँचा सके । इसके लिये उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए ।
हाल में बच्चों के प्रदर्शनों से कई लोग नाराज़ दिखे ।

उनकी दलील है कि यह उनके लिखने पढ़ने की उम्र है । बहुत से अभिभावक और शिक्षक जो उन्हें स्कूल लौटने की सलाह दे रहे है वे भूल रहे है कि जिन किताबों ने बच्चों को पर्यावरण संरक्षण का पाठ पढ़ा है उसी से सीख लेकर वे आज सड़कों पर है । वरना हमारी आपकी तरह वह भी चुप बैठते और परीक्षा पास करते और सबकुछ भूल जाते । किताबों की दुनिया अगर वास्तविक दुनिया से क्यों ? प्रश्न पूछने का अधिकार सभी को है । हमने भी कुछ प्रश्न पूछे होते तो आज धरती इतनी ना तप रही होती ।

बच्चों ने अपनी जिम्मेदारी निभा दी, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिये कुछ हो ही नहीं रहा है । अगर वास्तव में कुछ हो रहा है तो वहाँ की सरकार उनको समझा लेगी । मगर असल बात यह है कि बच्चों के ऐसे कदमों को सराहा जाना चाहिए क्योंकि यह बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रही है । मेरी नज़र में बच्चे बेहतर जरिया होते है परिवर्तन लाने के लिये। पर्यावरण जैसे मुद्दों पर जब बच्चे सोचने और बोलने लगेंगे तो सरकार और जनता को भी अपना एजेंडा और नज़रिया दोनों बदलने पर विवश होना पड़ेगा ।

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