नगर निगम में लूटतंत्र मालियों के वेतन पर डाका

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Lucknow. उत्तर प्रदेश में सरकार बदली पर अधिकारियों का चरित्र अब भी मैला ही है। लूट खसोट और उसकी बंदरबाट नीचे से लेकर ऊपर तक बदस्तूर जारी है। भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने का दम भरने वाली सरकार भी इन भ्रष्ट अफसरों के आगे मजबूर सी दिख रही है। जो खेल पूर्ववर्ती सरकारों के कार्यकाल में चल रहा था वह आज भी कायम है। तख्त बदल गए, ताज बदल गए पर स्थिति जस की तस है। हम बात कर रहे हैं नगर निगम लखनऊ की, जहां सोले के जय वीरू की तरह मिलकर ठेकेदार और अधिकारी जमकर मलाई काट रहे हैं। राज चाहे किसी का हो पर इन्हें डर नहीं लगता।

ई टेंडरिंग जैसे घोटालों के दोषियों की फाइलें शासन में धूल फांक रही हैं। आरोपी मौज उड़ा रहे हैं। यही कारण है कि निगम में लूट का कारनामा अब खुलेआम चल रहा है। भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारी अब सरकार को चुनौती दे रहे हैं। वहीं भ्रष्टाचार पर नकेल कसने का दम भरने वाली सरकार मौन है।

नगर निगम के अधिकारी अपनी काली करतूतों से बाज नहीं आ रहे। चारों चरफ लूट मची हुई है। कभी साफ सफाई के नाम पर लूट, कभी नाली खडंजा निर्माण पर लूट, कभी स्ट्रीट लाइट तो कभी पार्कों के सौंदर्यीकरण में लूट। नगर निगम अब लुटेरों का अड्डा बन गया है। बेखौफ अधिकारियों के एक के बाद एक कई कारनामें उजागर हो रहे हैं। नगर निगम अधिकारियों और कार्यदायी संस्थाओं के गठजोड़ से निगम में तैनात मालियों के मूल वेतन और भविष्य निधि पर डाका डाला जा रहा है। कई कर्मचारी और अधिकारी इस खेल में लिप्त हैं। लिहाजा शिकायत के बाद भी आला अधिकारियों के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही। इतना ही नहीं इसके खिलाफ आवाज उठाने वालों को नौकरी से भी हाथ धोना पड़ रहा है।

नगर निगम में कई कार्यदायी संस्थाएं रजिस्टर्ड हैं। इन संस्थाओं के माध्यम से निगम अपना काम करवाता है। माली, चैकीदार, सफाईकर्मियों की तैनाती की गई है। इन कर्मचारियों को नगर निगम दस्तावेजों में मजदूर की श्रेणी में दिखाता है। इन कर्मचारियों से शैक्षिक योग्यता के आधार पर अलग अलग कार्य करवाता है, लेकिन इनको मजदूरी दैनिक मजदूरों की तरह दिया जाता है। आपको बता दें कि कार्यदायी संस्थाओं का श्रम कानून के अंतर्गत रजिस्ट्रेशन होता है। श्रम कानून में मजदूरों का न्यूनतम वेतन के साथ ही उनका ईपीएफ कटवाना अनिवार्य होता है। ये संस्थाएं श्रम कानून के तहत श्रम विभाग में शैक्षिक योग्यता के अनुसार इन मजदूरों की तकनीकी और गैर तकनीकी कार्याें की प्रकृति के अनुसार कार्य दिखाता है। इन कर्मचारियों को अलग अलग पद और वेतन भी दिखाता है। इसमें कुशल, अर्धकुश और अकुशल मजदूर होते हैं।

ये संस्थाएं श्रम विभाग में दर्शाए गए कमचार्रियों के कार्य की प्रकृति के अनुरूप नगर निगम से भुगतान लेती हैं। नगर निगम कार्यदायी संस्थाओं के माध्यम से कमचारियों को रखता है। इसलिए वह पैसा सीधे कर्मचारियों को न देकर कार्यदायी संस्थाओं को भेजता हैै। जबकि नियम यह है कि कर्मचारियों को पूरा पैसा दिया जा रहा है या नहीं इसकी जांच करके ही कार्यदायी संस्थाओं के भुगतान को अप्रूवल मिलना चाहिए। मगर अधिकारियों और ठेकेदारों का गठजोड़ यहां कर्मचारियों की गाढ़ी कमाई को हजम कर रहे हंै। कार्यदायी संस्थाएं अधिकारियों की सह पर कर्मचारियों को उनका मूल वेतन भी नियमानुसार नहीं देती साथ ही पीपीएफ भी नहीं काटती, क्योंकि उन्हें निगम के अधिकारियों को हिस्सेदारी देनी होती है। नगर निगम में माली के पद पर तैनात राम गणेश यादव ने बताया कि मालियों को कार्यदायी संस्थाएं महज 4500 से 5500 रुपए ही देती हैं। जबकि निगम से उन्हें 7500 रुपए प्रतिमाह के हिसाब से मिलते हैं।

यादव ने बताया कि उद्यान अधीक्षक और ठेकेदारों की जोड़ी कर्मचारियों के ईपीएफ के साथ मूल वेतन को भी हजम कर लेती है। उन्होंने बताया कि महिला कर्मचारियों के साथ और भी नाइंसाफी हो रही है। महिलाओें को सिर्फ 4500 रुपए ही दिए जा रहे हैं। लगभग 7 सालों से लगातार यह खेल चल रहा है, लेकिन न तो अधिकारी सुनते हैं न ठेकेदार। उन्होंने बताया कि अधिकारियों और ठेकेदारों की इस बंदरबाट के खिलाफ आवाज उठाने का मतलब है कि अपनी नौकरी गवाना। जिसने भी इसके खिलाफ आवाज उठाई है उसे निकालकर बाहर कर दिया गया है। इसके भुक्तभोगी वह स्वयं हैं, जिन्हें 8 महीने तक नौकरी से निकाला गया, लेकिन काफी दबाव के बाद वापस रखा गया। इसकेे अलावा हालही में सन सिक्योरिटी एण्ड एलाइन्स सर्विस नामक कार्यदायी संस्था के अंडर में तेलीबाग में माली के पद पर तैनात मनोज कुमार लोधी ने भी ठेकेदारों संस्था के ठेकेदार जमील अहमद के खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाही तो उन्हें भी निकाल दिया गया। हालांकि मनोज ने बताया कि इसकी शिकायत उन्होंने श्रम आयुक्त से की है और सरोजनीनगर थाने में ठेकेदार के खिलाफ आॅनलाइन एफआईआर दर्ज कराई है।

माली राम गणेश यादव ने बताया कि श्रम कानून के मुताबिक कुशल मजदूर का न्यूनतम वेतन 350 रुपए प्रति दिन के हिसाब से होना चाहिए, लेकिन मिलता नहीं। ठेकेदार जब फर्म का रजिस्ट्रेशन करवाता है तो कुशल मजदूरों का न्यूनतम वेतन 350 रुपए दर्शाता है। इस हिसाब से एक कुशल कर्मचारी का मासिक वेतन 10,500 रुपए होना चाहिए। लेकिन उन्हें मिलता सिर्फ 4500 से 5500 ही है। बाकी का पैसा बंदरबाट में चला जाता है। श्रम कानून के तहत कार्यदायी संस्थाओं को कर्मचारियांे का ईपीएफ खाता भी खुलवाना अनिवार्य है। संस्थाएं बिना खाता खुलवाए ही निगम से कर्मचारियों का पूरा पैसा निकलवाकर मौज कर रही हैं। न तो निगम इनसे पूछता है और न ही और कोई जिम्मेदार। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक पार्कों की देखरेख, मार्ग प्रकाश, साफ सफाई आदि कार्यों के लिए कार्यदायी संस्थाओं को प्रति कर्मचारी के हिसाब से नगर निगम 250 रुपए प्रतिदिन देता है। इस हिसाब से हर महीने एक मजदूर की दैनिक मजदूरी 7500 रुपए बनती है, लेकिन ठेकेदार और अधिकारियों की नोच घसोट के बाद कर्मचारियों को महज 5000 से 5500 प्रतिमाह ही मिल पाता है। अधिकारियों की जेब भरने के लिए ठेकेदार कर्मचारियों के वेतन में कटौती कर रहे हैं इतना ही नहीं समय पर उन्हें सैलरी भी नहीं देते। कर्मचारियों को 2 से 3 महीने इंतजार करना पड़ता है।

हर महीने नगर निगम में ये कर्मचारी प्रदर्शन करते रहते हैं। नगर निगम में माली के पद पर तैनात राम गनेश यादव ने बताया कि वह जमील अहमद नाम के ठेकेदार की संस्था के द्वारा रखे गए हैं। चार-चार, पांच-पांच माह का वेतन ठेकेदार द्वारा रोका जाता है। उन्होंने बताया कि पिछले महीने मालियों ने उद्यान अधीक्षक गंगाराम गौतम से वेतन न मिलने की शिकायत की थी। मगर उद्यान अधीक्षक गंगाराम गौतम ने मालियों से कहा कि जिसे एक माह का वेतन लेना है, वह जाकर ठेकेदार जमील अहमद से ले ले। मैं उन्हें निर्देशित कर देता हूं। मालियों ने संयुक्त रूप से कहाकि जब वे चार-चार, पांच-पांच माह कार्य कर चुके है तो क्यों मात्र एक ही माह का वेतन लें? इस उद्यान अधीक्षक गंगाराम और ठेकेदार जमील अहमद ने कहा कि अगर वेतन लेना है तो लो, अन्यथा नौकरी से भगा दिये जाओगे। राम गनेश के मुताबिक अधिकारियों और ठेकेदार की मिलीभगत से कर्मचारियों की भविष्य निधि पर डाका डाला जा रहा है। इतना ही नहीं कर्मचारियों को धमकी भी दी जा रह है कि अगर वह इसके खिलाफ आवाज उठाएंगे तो उन्होंने निकाल दिया जाएगा। माली रामगणेश यादव ने बताया कि जनवरी माह में सभी माली और चैकीदारों ने इसके खिलाफ आवाज उठाते हुए अपर नगर आयुक्त का घेराव भी किया था, लेकिन वहां से भी कुछ हासिल नहीं हुआ। नगर निगम में भ्रष्टाचार से जुड़े मामले परत दर परत खुलते जा रहे हैं। अब देखना यह है कि उत्तर प्रदेश को भ्रष्टाचार मुक्त, साफ सुथरी एवं पारदर्शी व्यवस्था देने का दम भरने वाली योगी सरकार इस मामले में क्या कदम उठाती है। सरकार इस लूट की शासन स्तर पर जांच करवाएगी या फिर अभी विभागीय काकस ऐसे ही भ्रष्टाचार करता रहेगा।

कर्मचारियों की उपस्थिति में भी झोल
कार्यदायी संस्थांओं का खेल सिर्फ मजदूरों का ईपीएफ और दैनिक मजदूरी हजम करके ही नहीं खत्म हो रहा बल्कि यह नगर निगम को हर साल लाखों रुपए का चूना लगा रही हैं। संस्थाएं कर्मचारियों की उपस्थिति में भी लंबा खेल खेल रही हैं। संस्थाएं निगम से ज्यादा कर्मचारियों की उपस्थिति दिखाकर मोटी रकम ले रही हैं वहीं तैनाती के नाम पर आधे कर्मचारी भी मौके पर उपस्थित नहीं रहते। हालांकि इन संस्थाओं पर जांच बैठाने की बात कही जा रही है।

14 सालों से एक ही कुर्सी पर
नगर निगम में लूटतंत्र कितना फैला है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ट्रांसफर होने के बाद भी यहां अधिकारी कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं होते। वह दूसरी जगहों पर ज्वाइन नहीं करते, बल्कि निगम से चिपके रहते हैं। हालांकि इसे नगर निगम के प्रति उनका समर्पण भी समझा जाता है, लेकिन निगम के कई नेताओं ने बताया कि यह समर्पण नहीं बल्कि निगम मलाई का गोदाम है जिसे छोड़ने की इच्छा नहीं होती। उद्यान अधीक्षक गंगाराम गौतम पिछले 15 सालों से लगातार अधीक्षक की कुर्सी पर जमे हुए हैं। न जाने इस कुर्सी पर ऐसा कौन सा शहद लगा है कि वह इसे छोड़ना नहीं चाहते। नगर निगम के कई नेताओं से इस संबंध में बात की गई तो पता चला कि उद्यान अधीक्षक की कुर्सी सोने के अन्डा देने वाली मुर्गी की तरह है। नगर निगम के एक कर्मचारी ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि निगम में ऐसे तमाम अधिकारी हैं जिनकी अगर आय से अधिक सम्पत्ति की जांच हो तो उन्हें जेल जाना पड़ेगा।

कर्मचारी-अधिकारियों के सगे संबंधी चला रहे संस्थाएं
नगर निगम में दर्जनभर से ज्यादा ऐसी कार्यदायी संस्थाएं काम कर रही हैं। जो सीधे तौर पर निगम के कर्मचारियों के रिश्तेदार, भाई, सगे संबंधियों की हैं। इसीलिए इनका संरक्षण नगर निगम करता है। जिस कारण धडल्ले से बेधड़क लूटपाट मची है। उद्यान विभाग में अधीक्षक के पद पर तैनात गंगाराम गौतम के भाई अनिल गौतम फ्लोरा हाईटेक एवं नारायण इंटरप्राइजेज निगम नाम की कार्यदायी संस्था चला रहे हैं। नगर निगम में अधिकारियों और कार्मचारियों का गठजोड़ कार्यदायी संस्थाएं चला रहा है। नगर निगम सब कुछ जानते हुए भी मौन है। जबकि शासन से आदेश है कि निगम के कर्मचारियों और अधिकारियों के सगे संबंधियों की संस्थाएं निगम में काम नहीं कर सकती।

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