तानाशाह बनता भारत

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Lucknow. हाल ही के दिनों में सरकार द्वारा ऐसे कई फैसले लिए गए है या लिए जा रहे है जिससे साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि तक़रीबन हर स्वायत क्षेत्र में सरकार की दखलंदाज़ी बढ़ती जा रही है । ताज़ा मामला जस्टिस के ऍम जोसेफ के नियुक्ति का है । माना जा रहा है कि बी जे पी सरकार अपनी पुरानी रंजिश के चलते इनकी नियुक्ति में बांधाएं उत्पन्न कर रही है ।

इसके पहले भी सुप्रीम कोर्ट के पांच जज खुलकर मीडिया के सामने आ चुके है और उन्होंने लोकतंत्र के खतरे को जाहिर किया । साथ ही इस बात पर भी प्रकाश डाला कि कैसे सुप्रीम कोर्ट पर सरकारी दवाब के चलते फैसले और केस का प्रभावित हो रहे है ।

वैसे मौजूदा सरकार आते ही कोलोजियम सिस्टम को समाप्त करने में जुट गयी थी और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के जरिए न्यायपालिका में सरकारी हस्तक्षेप सुनुश्चित करना चाह रही थी । मगर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार के मंसूबो पर पानी फेर दिया । यह तो बात रही न्यायपालिका में हस्तक्षेप की । वर्तमान में सरकार कई महत्वपूर्ण संस्थाओं में बदलाव या सरकारी दखल को लेकर काफी सक्रिय भूमिका में है। मेडिकल काउंसिल को मेडिकल कमीशन में तब्दील करना, यू जी सी को ख़त्म कर उच्चतर शिक्षा आयोग गठन करने की वकालत करने के साथ ही सिविल सेवा परीक्षाओं में लैटरल इंट्री का मार्ग प्रशस्त किया जाना इनमे से एक है ।

सरकार राजनैतिक हस्तक्षेप के जरिए लगभग तमाम बड़ी संस्थाओं पर अपनी पकड़ मजबूत बनाना चाह रही है । साथ ही इसके नीतियों को भी अपने हिसाब से नियंत्रित और प्रभावित करने की जुगत में है जिससे लोकतंत्र की आज़ादी क्षीण हो सकती है ।

मौजूदा सरकार बहुमत में है । अतः हर जगह उसकी बढ़ती दखलअंदाज़ी और लगभग तमाम बड़ी संस्थाओं पर अपना नियंत्रण स्थापित करने की नीति चीन की तानाशाही प्रवृति से मेल खाती हुई आगे बढ़ रही है । यह कहा जा सकता है कि आने वाले समय में मौजूदा सरकार रही तो भारत की तानाशाही प्रवृति में वृद्धि दर्ज हो सकती है।

हाल ही में परिवर्तन सूचकांक बीटीआई 2018 द्वारा 129 देशों की सूची में  58 विकासशील देशों को तानाशाह बताया गया है जिसमें भारत भी शामिल है । यह रिपोर्ट  2015-2017 के अंतर्गत किये गए राजनैतिक गतिविधियों पर आधारित है।

हालांकि भारत का पूर्णतः तानाशाह हो जाना असंभव है मगर इस तरह से राजनैतिक हस्तक्षेप से संस्थाओं की स्वायत्तता पर असर पड़ेगा जो उसकी प्रगति और प्रदर्शन करने की श्रेष्ठता को प्रभावित करेगा ।

राजनीति को राजनीति तक ही सीमित रहना चाहिए ना की शिक्षा और सेवा क्षेत्र में दखलंदाज़ी से उसको राजनैतिक आवरण और राजनैतिक संरक्षण के रूप में पोषित कर राजनैतिक कार्यों और महत्वकांक्षाओं के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए । अभी हाल ही में राष्ट्रीय संस्थागत रैंकिग सुर्ख़ियों में है । गठन के पहले ही जीओ इंस्टिट्यूट का नाम आने से सरकारी महत्वकांक्षा जाहिर हो चुकी है और पता लग गया है कि वह अपने फ़ायदे के लिए किसी भी निज़ी कम्पनी को फायदा पंहुचा सकती है बजाए इस बात की परवाह किये कि ऐसी संस्थाओं के गठन का उद्देश्य क्या है । जब शिक्षा के स्तर पर ऐसी गड़बड़ियां और सरकारी मंसूबे जाहिर हो रहे है तो अन्य मसलों के बारे में यह सोच लेना चाहिए कि सरकारी दखल का क्या परिणाम हो सकता है ।

शिक्षा में ही नो डिटेंशन पालिसी पर अब भी सरकारे गंभीर नहीं है । अब राज्य सरकारों को छूट है कि वे अपने राज्य में इसे लागू करते है या नहीं । मतलब साफ है इस पॉलिसी का भी इस्तेमाल राजनैतिक रूप से सरकारों द्वारा किया जा सकता है, इसकी बारीकियां समझे बगैर।

क़रीब -क़रीब बड़ी संस्थाओं पर इस सरकार ने अपनी पहुँच सुनिश्चित कर ली है।  सवाल ये नहीं है कि इन बड़ी संस्थाओं में अचानक फेरबदल या हस्तक्षेप से कितनी प्रगति सुनिश्चित होगी । सवाल यह है कि अचानक से सरकार बड़ी संस्थाओं में अपनी पहुँच मजबूत क्यों कर रही है ? क्या यू जी सी अबतक अपना काम नहीं कर पा रहा था । अगर नहीं कर पा रहा था तब भी थोड़े बहुत बदलाव के साथ इसमें सुधार की गुंजाईश थी ना कि नया आयोग लेकर आने की । लैटरल इंट्री से भी सरकार राजनैतिक फैसले या लाभ के लिए उच्च पदों पर अपने हिमायती लोगों को मौका दे सकती है । इसमें भी थोड़े बहुत सुधार से स्थिति को सुधरने के आसार थे। लेकिन सरकार अब ब्यूरोक्रेशी में दख़ल दे चुकी है । हाल ही में 2004 बैच के एक आई ए एस ऑफिसर ने 14 साल काम करने के बाद अपना इस्तीफा इसलिए दे दिया क्योंकि वहाँ दबाव के बीच वह जो काम करना चाहते थे वह नहीं कर पा रहे थे । यह बात किसी से  छिपी नहीं है कि ऐसे दबाव आधिकारिक कम राजनैतिक ज़्यादा होते है  । अगर ऐसे ही हालात रहे तो राजनैतिक दखलंदाज़ी से काम और योजनाएं सब प्रभावित होंगी जो कि कई अन्य मुश्किलों को पैदा करेंगी ।

राजनीति की साख दिनोंदिन गिरती जा रही है। आलम यह है कि अब आम जनता राजनीति को सबसे गन्दी चीज़ कहने लगी है । ऐसे में यह गंदगी स्वायत संस्थानों में भी पहुँच जाये तो आप पतन की कल्पना कर सकते है । राजनैतिक विचार विमर्श और गुणवत्ता को बढाने की जरुरत है मगर राजनैतिक दखलअंदाज़ी के बगैर । संघवाद के ढांचे के अनुरूप ही सभी संस्थाओं को काम करने की आज़ादी मिले ताकि वह राजनैतिक दबाव से मुक्त होकर अपनी सफलता सुनुश्चित करे जैसा की डीआरडीओ करता आया है । फंड जुटाने , नीतियां बनाने , आमजन तक सुविधाओं को सुलभ बनाने का काम सरकार करे तो अच्छा है बजाये इसके की सरकार अपने राजनैतिक फायदे के लिए बड़े संस्थानों में अपनी पकड़ मजबूत करे ।

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