जातिगत आरक्षण ब्राम्हणों के साथ धोखा, बीजेपी ने दिखाए रंग

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Lucknow. 2011 की जनगणना के मुताबिक, देश की कुल आबादी में 24.4 प्रतिशत हिस्सेदारी दलितों की है। 543 सदस्यीय लोकसभा में 84 सीटें एससी समुदाय के लिए आरक्षित है, जबकि 47 सीटें एसटी के लिए आरक्षित है। इस हिसाब से 131 सांसद तो आरक्षण से इस वर्ग के बन जाते हैं। इसके इतर भी कई और भी इस वर्ग से आते हैं। वर्तमान में 150 से अधिक इसी वर्ग से लोकसभा सांसद हैं। आपको बता दें कि भाजपा के सबसे ज्यादा 67 सांसद इसी वर्ग से हैं। अगर राज्य की विधानसभाओं की बात करें तो सभी राज्यों को मिलाकर कुल 607 विधानसभा सीटें एससी के लिए रिजर्व हैं और 554 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं।

अब सवाल यह है कि 150 से अधिक सांसद इनके फिर भी ये कमजोर क्यों गिने जाते हैं? आरक्षण इन्हें क्यों? अप्रैल में जिन 12 राज्यों में हिंसा हुई, वहां एससी/एसटी वर्ग से 80 लोकसभा सदस्य हैं। जहां इनके सबसे ज्यादा सांसद थे वहां सबसे ज्यादा हिंसा हुई थी। आप समझ सकते हैं। यह सब जानते हुए भी बीजेपी ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को दरकिनार कर संसद में बिल पारित कर एसटी एससी कानून को और मजबूत कर दिया। और सवर्णों को कमल खिलाने की सजा दी गई। देश में आरक्षण यह कह कर लगाया गया कि इन वर्गों की समाज में स्थिति ठीक नहीं है। जबकि वास्तविकता न तो सरकार जानती है न कोई और। क्योंकि सिस्टम में किसकी कितनी भागेदारी है इसका आकड़ा किसी के पास नहीं । न तो इस पर कोई सर्वे हुआ और न ही इसका कोई आकड़ा है। बस आंख मूंदकर हम सब यह मान बैठे हैं कि दलितों को आरक्षण की जरूरत है। दरअसल देश में सवर्णों के खिलाफ साजिश चल रही है।
suyash mishra bhasmasur

यही कारण है कि आर्थिक आधार पर आरक्षण का आवंटन नहीं हुआ। सवर्णों को स्वत: सम्पन्न मान लिया गया है। एनसीआरबी के मुताबिक देशभर में एससी-एसटी एक्ट के तहत 47,369 शिकायतें दर्ज हुई थीं। इसमें से 13% यानी 6259 शिकायतें झूठी पाई गईं। मध्यप्रदेश में 2014 में एससी-एसटी एक्ट के तहत मप्र में 4871 मामले दर्ज थे, जो 2017 में बढ़कर 8037 हो गए। बावजूद इसके बीजेपी ने इस कानून को और मजबूत बनाकर संसद में पास करवा दिया। सुप्रीम कोर्ट ने 20 मार्च 2018 को अपने एक फैसले में राजीव गांधी के दौर वाले एससी—एसटी 1989 एक्ट पर यह कहकर स्टे लगा दिया था कि इस कानून का दुरुपयोग हो रहा है और साथ में यह भी कहा था कि इससे जातिवाद बढ़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी थी।

इसके बाद 1 अप्रैल को देशभर में दलितों ने आंदोलन किया। इसके बाद बीजेपी दलितों के लिए मैदान में उतर आई और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को धता बताते हुए एससी एसटी एक्ट को और मजबूती के साथ संसद में पारित करवाकर दलितों की वाहवाही लूट ली। 2006 में एम नागराज बनाम भारत सरकार मामले के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एसटी एससी समाज के प्रमोशम में रिजर्वेशन देने से पहले राज्यों को इनके पिछड़ेपन के आकड़े जुटाने चाहिए। साथ ही सरकारी नौकरी एवं कुल प्रशासनिक क्षमता में उनके अपर्याप्त प्रतिनिधित्व के बारे में भी तथ्य जुटाएं।

 

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