गड्ढे नहीं भर रहे हो, जख्म कुरेद रहे हो

0
255

विरासत में मिले जख्मों (गड्ढों) को भरने में वक्त लगता है…हर समर्थक यही कह रहा है। मैं मान लेता हूं। पर कोई यह बताएगा की इन टूटी सड़कों पर लग रहा मरहम कितने दिन चलेगा? इस पर विचार किसी ने किया। मैं बताता हूं, शायद एक महीने, दो महीने या फिर एक साल। उदाहरण के लिए आप बीकेटी से कुम्हरावां मार्ग आइए यहां एक तरफ मरहम लगता है और दूसरी तरफ जख्म फिर हरा हो जाता है। जख्म क्या ..ससुरा नासूर बन गया हैै। हाल लगभग ऐसा ही हर जगह है। इस तस्वीर में भी कुछ ऐसा ही है। तस्वीर पुरनिया पुल के बाईं ओर की सड़क की है। यहां भी महरम कई बार लगा पर महीने भर में जख्म हरे हो गए। यकीन मानिए जितना धन मरहम में लगा उतने में नई सड़क बन जाती। अब सवाल यह है कि सरकारी धन से मरहम लगाने में मशगूल सरकार अंग्रेजों से कुछ क्यों नहीं सीखती। 21वीं सदी है तकनीक में दुनिया आसमान छू रही है और हम लंगूर बने हैं। आपको बता दें कि अंग्रेजों के जमाने में बना पक्का पुल आज भी खड़ा है, जबकि सुना है कि अंग्रेज जाते समय इसे डेड बता गए थे। आखिर ऐसी कौन सी तकनीक से वह सड़कें और पुल बनवाते थे। ​इस पर विचार विमर्ष, शोध न कर सरकार पुराने ढर्रे पर आधारित गिट्टी पर गरम डामर चिपकाकर वर्तमान सरकार भी अपनी उपलब्धि गिना रही है। मोदी जी हनुमान जी से भी ज्यादा हवाई यात्राएं कर चुके हैं। विदेशों में सड़कें देखी ही होंगी। उन्हें सोचना चाहिए था कि आखिर वह कौन सी टेकनिक यूज करते हैं। ..पर फुर्सत किसे है। जहां वह जाते हैं वहां सड़क बन जाती है। सरकार को यह सोचना चाहिए की गड्ढे भरने से जख्म नहीं भरेंगे। इस समस्या के लिए शोध जरूरी है। एक कहावत है सस्ता रोए बार बार महंगा रोए एक बार, हमे भरोसेमंद और टिकाउ व्यवस्थाएं चाहिए, टेम्परेरी नहीं।

loading...

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here