कोरोना- कहूं कक्कू शब्दभेदी बांड़ न छोड़ दें

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दुष्ट कोरोना! अगर आज तू थाली, शंख और घंटियों की आवाज से भी नहीं गया तो मुझे अपने तरकस से शब्दभेदी बांड़ निकालने ही पड़ेंगे। ये चाइना, इटली, फ्रांस नहीं है ये हिंदुस्तान है। हमने पकन्ना, चोटी कटवा, मुंहनोचवा जैसे राक्षसों को ऐसे ही शंख, थाली, टार्च से भगा दिया। अरे! वो पानी तक नहीं मांग पाए। जरा सोच तेरी हालत क्या होगी। मुझे मजबूर मत कर अगर मैंने शब्द भेदी बाड़ एक बार तरकस से निकाल लिए तो फिर उसे वापस नहीं रख सकूंगा। फिर दुहाई देते फिरोगे, लेकिन तुम्हे मॉफी नहीं मिलेगी। इसलिए चला जा, दूर हो जा मेरे हिंदुस्तान से। इतना कहने के बाद 70 साले के बड़के कक्कू का मुंह गुस्से से लाल हो गया था। भुजाएं फड़कने लगी थीं। आंखों से आग निकल रही थी ऐसा मामूल पड़ रहा था जैसे सूरज निगल गए हों। इतनी कसकर तो बाली ने राक्षस का वध करके किष्किंधा लौटकर सुग्रीव को भी नहीं ललकारा था। जितनी करारी दहाड़ कक्कू ने लगाई थी। गांव के कक्कू बचपन से ही बातूनी रहे। अपनी बातन से उई बड़े बड़े योद्धन का धूल चटाय दिहिन। कक्कू कभी सुविधाभोगी नहीं रहे या यू कहें कि उनके जवानें में सुविधाएं थी नहीं। पर उनका रेउला हमेशा कायम रहा। बंदूक तौ उस जमाने में दस कोस के गांवों में नहीं थी पर कक्कू का डायलॉग उस समय से फेमस था कि ‘अत्ती गोली चलिहैं कि छर्रा बिनय वाले अमीर होई जइहैं’ बहरहाल कक्कू आजौ बड़ी से बड़ी चुनौती का पुरानी तर्ज पर ललकार देति हैं। अब उनको समझा पाना मुश्किल है कि उनकी जंग आधुनिक ‘कोरोना’ से है जिससे ललकारकर, थाली बजाकर, शंख बजाकर, हो हल्ला करके नहीं निपटा जा सकता। कक्कू नहीं समझ सकते पर देश के जिम्मेदार समझ सकते हैं। अब शंख, हल्ला हो चुका है अब जरूरत है शख्त कदम उठाने की सुविधाओं को बढ़ाने की। कोरोना को लेकर और मजबूत कदम उठाने की। अगर हम कक्कू की तरह सीना ठोककर तरकस से सिर्फ शब्दभेदी बांड़ निकालते रहे तो कोरोना देश से निकल नहीं पाएगा। अब पूरा देश जिम्मेदारों की तरफ टकटकी लगाए देख रहा है।

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