उपचुनाव में विपक्ष की रणनीति को मिली कामयाबी

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लखनऊ। प्रदेश में उपचुनाव के नतीजे एक बार फिर भाजपा के लिए जोरदार झटका साबित हुए हैं। पार्टी को कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा में हार नसीब हुई है। इससे जहां विपक्ष उस पर पूरी तरह से हमलावर है और 2019 में महागठबन्धन की सफलता का दावा कर रहा है, वहीं भाजपा का कहना है कि उपचुनाव के नतीजों के विपरीत पार्टी एक बार फिर लोकसभा चुनाव में प्रचण्ड बहुमत से जीतेगी।
लोस चुनावों तक होगा भाजपा का सफाया
नूरपुर में सपा प्रत्याशी नईमुल हसन ने भाजपा उम्मीदवार अवनी सिंह को 5678 वोटों से हराकर जीत हासिल की। जीत से उत्साहित नईमुल हसन ने कहा कि 2019 के लोकसभा चुनावों तक भाजपा का सफाया हो जाएगा। उन्होंने कहा कि हमारा चुनाव भारतीय जनता पार्टी से था। इस दौरान कई जगह ईवीएम खराब होने की खबरें आई। रमजान के महीने के कारण मुस्लिम मतदाता कम निकल कर आए, लेकिन फिर भी उनके सहयोग से हमारी पार्टी को विजय प्राप्त हुई।
वर्तमान लोस में यूपी की पहली मुस्लिम सांसद बनी तबस्सुम
वहीं कैराना में रालोद उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने भाजपा की मृगांका सिंह को करारी शिकस्त दी। इस जीत के साथ ही तबस्सुम हसन वर्तमान लोकसभा में उत्तर प्रदेश की पहली मुस्लिम सांसद बन गई हैं। तबस्सुम हसन इससे पहले वर्ष 2009 में बसपा सांसद थीं। इस बार उन्होंने हुकुम सिंह के निधन से रिक्त हुई सीट पर उनकी बेटी मृगांका सिंह को हराया है।
देखा जाए तो इससे पहले वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी मुस्लिम प्रत्याशी को उत्तर प्रदेश से जीत नहीं नसीब हुई थी। भाजपा ने सूबे की 80 लोकसभा सीटों में से 71, उसके सहयोगी अपना दल ने 02 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि समाजवादी पार्टी में मुलायम कुनबे को 05 और कांग्रेस को महज 02 सीटें नसीब हुईं थीं। इस बार अखिलेश यादव ने पहले तबस्सुम हसन को रालोद में शामिल कराया और फिर वह विपक्ष के उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतरीं। इस तरह अब लोकसभा में तबस्सुम हसन के रूप में रालोद ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा ली है। इससे पहले पार्टी मुखिया अजित सिंह और उनके बेटे जयन्त सिंह को भी लोकसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था और पार्टी का खाता तक नहीं खुला था।
संयुक्त विपक्ष का रास्ता अब बिलकुल साफ 
इस जीत के बाद तबस्सुम ने इसे सच की जीत करार दिया। उन्होंने कहा कि मैने जो कुछ भी कहा है उसके साथ मैं आज भी हूं, एक साजिश रची गई थी। मैं कभी नहीं चाहूंगी कि भविष्य के चुनाव ईवीएम से न हों। संयुक्त विपक्ष का रास्ता अब बिलकुल साफ है।
वहीं भाजपा प्रत्याशी मृगांका सिंह ने तबस्सुम को चुनाव जीतने पर बधाई दी है। उन्होंने कहा कि भाजपा को बहुत लोगों ने वोट किया लेकिन गठबंधन कुछ हजार वोट से जीत दर्ज करने में सफल रहा। वह गठबंधन प्रत्याशी को इस जीत के लिए बधाई देती हैं। मृगांका ने कहा कि इस उपचुनाव के बाद से गठबंधन मजबूती के साथ उभरकर सामने आया है। हमें भविष्य के लिए और बेहतर तैयारी करनी होगी। उन्होंने कहा कि कहीं न कहीं हम अपनी बात जनता को समझा नहीं पाए। पार्टी ने इस चुनाव में बहुत मेहनत की। मैं खुद पार्टी को निराश करने के लिए अपराधबोध महसूस कर रही हूं।
अखिलेश के हौसले हुए बुलन्द
उपचुनाव के नतीजों के बाद समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव बेहद गदगद हैं। उन्होंने कहा कि हमने भाजपा को उसी के तरीके से मात दी है। कहा कि जो खेल भाजपा हमारे साथ खेलती थी, वही खेल हमने सीखा हैं उनसे। भाजपा मुद्दे भटकाने की राजनीति करती है। उन्होंने कहा कि जब हम विकास की बात करते थे, तो वह सामाजिक बात करते थे। समाजवादी लोगों ने अब उन्हीं से सीख कर दलितों, किसानों के मुद्दे उठाए हैं।
अखिलेश ने कहा कि भाजपा की कोशिश थी कि मुद्दों को बदल दिया जाए, लेकिन लोगों ने जनता को धोखे देने का जवाब दिया है। यहां के नतीजे देश की राजनीति के लिए एक बड़ा संदेश है। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी की ईवीएम पर जो राय पहले थी वो राय आज भी है। उन्होंने इस जीत को लेकर बसपा, रालोद, आम आदमी पार्टी, कांग्रेस सहित सभी सहयोगी पार्टियों को धन्यवाद दिया है।
आज़म बोले कुदरत का बदला
वहीं पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म खान ने बयान दिया है कि विपक्ष की एकता और भाजपा का जुल्म बड़ा है। भाजपा ने लोगों से जीने का अधिकार छीन लिया, लोग दहशत में रह रहे हैं। देश की चौथाई आबादी डर में सोती और जागती है। ये कुदरत का बदला है, जो इंसाफ का रास्ता छोड़ेगा उसकी ऐसी ही जिल्लत होगी।
जयंत बोले जिन्ना की हुई हार जीत गया गन्ना
वहीं राष्ट्रीय लोकदल के उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने भी चुनाव नतीजों पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि जिन्ना हारा और गन्ना जीत गया। उन्होंने आरएलडी उम्मीदवार तबस्सुम हसन का समर्थन करने वाली सभी पार्टियों का धन्यवाद किया। जयंत ने कहा कि आगे भी गठबंधन होगा और साथ मिल कर सांप्रदायिक ताकतों का मुकाबला किया जाएगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि 2019 के लोकसभा चुनावों में भी ऐसे ही नतीजे मिलेंगे। जयंत ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि मंगल यान से लेकर 9 किलोमीटर तक की सड़का का श्रेय जब वही लेते हैं तो हार की जिम्मेदारी भी उन्ही को लेनी चाहिए।
लम्बी छलांग के लिए दो कदम हुए पीछे
उधर उपचुनावों के इन परिणामों के बाद उप मुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा ने कहा कि उपचुनाव और लोकसभा चुनाव में अंतर होता है। उपचुनाव क्षेत्रीय आवश्यकताओं पर होते हैं, जबकि लोकसभा चुनाव के दौरान मुद्दे अलग होते हैं। उन्होंने कहा कि उपचुनाव में जातिगत भी असर पड़ता है। उपचुनाव के मुद्दे लोकसभा से अलग रहते हैं। उन्होंने दावा किया कि यूपी में भाजपा भारी बहुमत से लोकसभा चुनाव जीतेगी। जबकि केंद्रीय गृहमंत्री और लखनऊ से सांसद राजनाथ सिंह ने बयान दिया है कि लम्बी छलांग लगाने और आगे जाने के लिए आपको दो कदम पीछे जाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि उपचुनाव के परिणाम हमारे लिए वही कदम है।
उपचुनाव के नतीजे भाजपा के लिए नहीं साबित हुए बेहतर
इससे पहले भाजपा को गोरखपुर और फूलपुर लोक सभा उप चुनाव में भी हार का सामना करना पड़ा था। गोरखपुर में सपा के प्रवीण कुमार निषाद ने भाजपा के उपेंद्र दत्त शुक्ला और फूलपुर में सपा के नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल ने भाजपा के कौशलेंद्र सिंह पटेल को हराया था। गोरखपुर सीट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और फूलपुर उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के इस्तीफे से खाली हुई थी। हालांकि कानपुर देहात की सिकन्दरा विधानसभा में हुए उपचुनाव में पार्टी प्रत्याशी अजीत पाल जरूर अपने पिता मथुरा पाल के निधन से रिक्त हुई सीट पर जीत दर्ज करने में सफल रहे थे। उन्होंने सपा की सीमा सचान को हराया था।
विपक्ष की जीत में अहम साबित हुआ ये समीकरण
सपा ने कैराना के पार्टी विधायक नाहिद हसन की मां तबस्सुम हसन को रालोद प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतारा। इससे गठबन्धन के उम्मीदवार को मुस्लिम वोट और रालोद के परम्परागत मतों का लाभ मिला। बसपा के मैदान में नहीं उतरने के बावजूद विपक्षी एकता के कारण उसके वोट गठबन्धन के पक्ष में गए। महागठबंधन के कारण रालोद प्रत्याशी को जाट और मुस्लिम के अलावा दलित वोट बोनस के रूप में मिला। तबस्सुम हसन के देवर कंवर हसन ने जिस तरह मैदान से पीछे हटते हुए अपनी भाभी को समर्थन दिया, उससे समीकरण विपक्ष के पक्ष में आ गए। कंवर हसन ने पिछले लोकसभा चुनाव में 1.66 लाख वोट हासिल किए थे। कैराना में भाजपा की हार की एक अन्य वजह पार्टी उम्मीदवार मृगांका सिंह को सहानुभूति वोट नहीं मिलना भी माना जा रहा है। पार्टी को लग रहा था कि मृगांका को टिकट देने से उसे उन लोगों का साथ मिलेगा, जिन्होंने हुकुम सिंह के पक्ष में वोट दिए थे, लेकिन नतीजों से ऐसा नजर नहीं आ रहा है।
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