अस्पताल में पप्पू ने पास कर ली धैर्य की ‘अग्नि परीक्षा’

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Lucknow. रात्रि के 9 बज रहे थे, मोटरसाइकिल से तकरीबन 150 किमी का सफर तय करने के बाद वापस घर लौटा। मारे ठंड के अंतड़ियां तक कांप रहीं थी। भोजन को भूल जस तस बेड पर लेटा ही था, अभी रजाई में गुनगुनाहट भी न आई थी कि एक फोन आया। …’दूर के एक रिश्तेदार चोटिल हो गए हैं, जिला अस्पताल से जवाब हो गया है, अब उन्हें मेडिकल कॉलेज लखनऊ के लिए रेफर किया गया था। हमारी भी संवेदनशीलता उफान मारने लगी। हो—हल्ला के बीच एक लोवर, जॉकेट और पुरानी सॉल ओढ़, अपनी दुपहिया वाहन से मेडिकल कॉलेज की ओर प्रस्थान किया। 10 बज चुके थे। ट्रामा सेंटर में प्रवेश करते ही बाईं ओर टंगे एक बोर्ड पर नजर पड़ी, ”अस्पताल में तोड़ फोड़, डॉक्टर, स्टॉप के साथ अभद्र व्यवहार गैर जमानतीय अपराध है। 3 साल तक की सजा 50,000 रुपए तक का जुर्माना।” विद्या कसम झूठ नहीं बोलूंगा, 3 साल की सजा से मुझे बिल्कुल डर नहीं लगा, लेकिन 50,000 जुर्माना कहां से दूंगा, यह बात मन ही मन मुझे कचोट रही थी, इसलिए मैंने सांढ पत्ती न झाड़ते हुए पप्पू बनकर चुपचाप धैर्य की अग्नि परीक्षा में बैठना उचित समझा। तभी ..वाउं वाउं करती एक गाड़ी ट्रामा सेंटर के गेट पर आ धमकी, गाड़ी के अंदर से एक्सिडेंट में घायल हमारे रिश्तेदार लेटे ..आय..हाय..जैसी विचित्र आवाजें निकाल रहेे थे।

गाड़ी से उतार जस तस उन्हें इमरजेंसी में धकेला। दाहिने हाथ पर हमारी ही उम्र के तीन लोग बैठे थे। वेश―भूषा से डॉक्टर, लेकिन उम्र से स्टूडेंट ही लग रहे थे। …रुको! कहां घुसे आ रहे हो, बाहर निकलो। ऐसा कहते हुए उसमें से एक ने मुझे डपटा।..मुझे ऐसा प्रतीत हुआ जैसे बिना बात के किसी ने दो चार थप्पड़ जड़ दिए हों। ..फिर भी धैर्य धरते हुए मैंने कहा, एक्सिडेंटल केस है। सिर पर चोट लगी है, जल्दी देखिए। मरीज को छुए बिना वेशभूषा से डॉक्टर से लगने वाले साहेब ने, सिटी स्कैन समेत पांच जांचे लिख दीं और स्ट्रेचर इमरजेंसी से बाहर करने के लिए कहा, मैंने सोचा अब इलाज शुरू होगा, जल्द ही रिश्तेदार चेतन्य हो जाएंगे। ईश्वर की कृपा से थोड़ा बहुत जुगाड़—व्यवहार काम आया जल्द ही जांच के साथ रिपोर्ट भी मिल गई। अब 11 बज चुके थे। अब भी रिश्तेदार वही पुरानी आवाजें निकाल रहे थे। बड़ी उम्मीद और आशा के साथ मैं डॉक्टर साहेब के पास गया और रिपोर्ट दिखाने लगा। डॉक्टर बोले…ठीक है, ठीक है अभी बाहर ही रहिए, जल्द ही न्यूरो के डॉक्टर आएंगे वहीं देखेंगे, अभी वह तीसरी मंजिल पर हैं।

इंतजार करते करते 11 से 12 बज बज गए। इस दौरान कई बार मैं अंदर जाकर पूछता रहा। रिश्तेदार अब भी कराह रहे थे,लेकिन डॉक्टर साहेब नहीं आए। कसम वेलेनटाइन डे की इतना इंतजार बड़े से बड़े प्रेमी ने अपनी प्रेमिका के लिए भी नहीं किया होगा।.. झूठ नहीं बोलूंगा प्रतीक्षा करने की इतनी असीम शक्ति मुझे 50 हजार जुर्माने के डर से ही आई, वरना अब तक तो लंका कांड हो जाता, भले ही अगले स्ट्रेचर पर मैं खुद होता। खैर..अब इंतजार मंहगाई से भी तेज गति से दौड़ रहा था, डॉक्टर कब आएंगे सभी यही सोच रहे थे। इमरजेंसी के पीआरओ थोड़ा परिचित थे मैंने सोचा लगे हांथ मदद मांगी जाए, कमरे में घुसा तो साहब नदारत थे। पूछताछ में पता लगा कि 2—4 घंटे आने से रहे। दूसरे मरीजों की तरह धैर्य पकड़कर इंतजार करने के अलावा दूसरा कोई रास्ता न था। रिश्तेदार समेत दूसरे मरीज भी तरह तरह की आवाजें निकाल रहे थे। मुझसे किसी का दर्द देखा नहीं जा रहा था। मैं कई बार अंदर गया और डॉक्टरों से कहा कम से कम एक बार देख लीजिए, डॉक्टर बोले रिपोर्ट आ जाए देख ही लेंगे।

अब तुम्ही तो हो नहीं और मरीज भी हैं। करीब पौने एक बजे गेट के बाहर से बिना वर्दी के एक सज्जन अस्पताल में प्रवेश किए, रिपोर्ट देखने लगे तो पता चला यही न्यूरो वाले हैं। अब न्यूरो के करीब 20 से 25 मरीज हो गए थे। डॉक्टर को देख मेरा चेहरा खिल उठा था, यह सोचकर कि शायद अब रिश्तेदार का इलाज शुरू हो जाएगा। देखरेख की इस प्रक्रिया में एक और घंटा बीत गया। अब पौने दो बज चुके थे। सबकी रिपोर्ट लेकर न्यूरो वाले तीसरी मंजिल पर चढ़ गए यह कहते हुए कि इंतजार करिए। करीब तीन बजे डॉक्टर साहेब लौटकर आए और कहा आपको न्यूरो से क्लियरेंस मिलता है। …मैंने कहा अब क्या करना है, डॉक्टर बोले इमरजेंसी में जाओ और पूछो दिमाग की दही मत करो। चार घंटे से ज्यादा बीत चुके थे अस्पताल के सभी तलों की खाक छानने के बाद भी रिश्तेदार को एक गोली तक नसीब न हुई। ईश्वर की असीम अनुकंपा थी कि वह अब भी सलामत थे, वरना बिना इलाज एक्सीडेंटल केस का मरीज इतने लंबे इंतजार में तो 3—4 बार परलोक सुधार जाता है।

ऊपर से डॉक्टर साहेब की 440 बोल्ट से ज्यादा तेज झटके देने वाली बातचीत। यह पीड़ा असहनीय थी, खून खौल रहा था, मुझे सामने डॉक्टर नहीं अंग्रेज दिख रहे थे पर वहीं 50 हजार जुर्माने वाली बात के चलते मैं क्रांतिकारी बनने से बिचुक रहा था। जस तस मैं फिर से इमरजेंसी में घुसा और बोला साहेब न्यूरो से क्लियरेंस हो गया है अब क्या करना होगा। डॉक्टर साहेब फिर डपटते हुए बोले…यार तुम तो नहा धो के पीछे पड़ गए हो। खैर…तनतनाते हुए वह बाहर आए और स्ट्रेचर पर टूटे फूटे लेटे हमारे रिश्तेदार को बेभाव कई बार अल्टा पल्टा। अब रिश्तेदार के मुंह से आय..हाय की आवाजें तेज हो गईं थीं। डॉक्टर बोले, ऐसा है इनको अंदर ले जाओ और पट्टी करवा दो, ज्यादा घबराने की बात नहीं है। सब ठीक है। हमने सोचा गंगा नहाए। अंदर गया तो हेड ब्वाय नदारद, इन्वेस्टीगेशन किया तो पता चला कोने वाले बेड पर जो दो लोग घोड़ा बेचकर सो रहे हैं वह हेड ब्वाय ही हैं। मैंने दबी आवाज डॉक्टर से कहा इनको जगवा दीजिए, पट्टी करवा दीजिए। डॉक्टर बोले यार पीछे मत पड़ो अभी उठ जाएगा। पट्टी भी हो जाएगी।.. मुझे ऐसा लगा जैसे वह मुझसे पीछा छुड़ा रहा है। थोड़ी देर इंतजार करने के बाद नर्स से कहा, मैडम इनको उठा दीजिए, नर्स बोलीं उनके चक्कर में डॉक्टर नहीं पड़ते मैं कैसे पड़ूं।

मेरी स्थिति ऐसी हो गई जैसे शोले पिक्चर में ठाकुर की। वह गब्बर को मौत की नींद सुलाने के लिए बेताब तो रहता है पर उसके तो हांथ ही कटे थे। मेरी स्थिति भी गब्बर वाली ही थी, मेरे हांथ तो थे पर वही 50 हजार जुर्माने वाली बात। बहरहाल थोड़ी देर बाद एक और हेड ब्वाय आया। थोड़ा घूमने घामने के बाद उसने परोक्ष रूप से गरियाते हुए रिश्तेदार की पट्टी कर दी। इसी के साथ हमारी छुट्टी कर दी गई। अस्पताल से सकुशल निकलने के बाद हमने ईश्वर से यही कामना की, हे ईश्वर अब कभी मेडिकल कॉलेज लखनऊ में हमारे किसी रिश्तेदार को न आना पड़े। इसी के साथ अस्पताल में धैर्य की परीक्षा में ‘पप्पू’ अव्वल दर्जे से पास हो गया।

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